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राजस्थान पत्रिका का 68 वां स्थापना दिवसः कवि आलोक का वर्तमान राजनीति पर कटाक्ष, ‘दिलों में भेदभाव, घृणा समाज में, यही तो वर्तमान राजनीति शास्त्र है

पत्रकार और प्रसिद्ध कवि आलोक श्रीवास्तव ने शिव तांडव का हिंदी अनुवाद मे लिखी कविता भी पढ़कर श्रोताओं की दाद पाई

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जयपुर। राजस्थान पत्रिका के 68 वें स्थापना दिवस पर आज अल्बर्ट हॉल पर गुलाल आतिशबाजी कार्यक्रम के दौरान देश के जाने-माने कवियों ने एक से बढ़कर एक कविता पेश करके श्रोताओं को गुदगुदाया। पत्रकार और प्रसिद्ध कवि आलोक श्रीवास्तव ने अपनी कविता के जरिए जहां वर्तमान राजनीति पर कटाक्ष किया तो वहीं उन्होंने शिव तांडव का हिंदी अनुवाद करके शिव की महिमा का भी गुणगान किया। प्रसिद्ध कवि आलोक श्रीवास्तव ने अपने कविता की शुरुआत वर्तमान राजनीति पर कटाक्ष करते हुए कही।

उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कविता का भी जिक्र किया तो राजधानी जयपुर का इतिहास, गंगा जमुना तहजीब और शौर्य का भी वर्णन किया। कवि आलोक श्रीवास्तव ने यह भी कहा कि 30 साल के कविता जीवन में ऐसा पहला मौका है जब सूर्य के ताप के सामने कविता पढ़नी पढ़ रही है।

वर्तमान राजनीतिक पर कटाक्ष
कवि आलोक श्रीवास्तव ने वर्तमान राजनीति पर कटाक्ष करते हुए कहा कि "जो दिख रहा है सामने वही दृश्य मात्र हैं, जो लिखी रही है पटकथा वही मनुष्य मात्र है। दिलों में भेदभाव हो, घणा समाज में, यही तो वर्तमान राजनीतिक शास्त्र है'।

नए नियम समय के हैं, असत्य सत्य हैं, भरा पड़ा है छल से जो वहीं सुपात्र है। साम-दाम, दंड-भेद का नया चलन है जो यहां कुपात्र है वही सुपात्र है। विचारशील मुग्ध हैं कथित प्रसिद्धि पर, विचित्र है समय विवेक शुन्य मात्र है। घिरा हुआ है पार्थ पुत्र चक्रव्यू में, असत्य साथ और सत्य एकमात्र हैं। कहीं कबीर सूर की कहीं नजीर की, परंपरा से धन्य यह ग़ज़ल का छात्र है, जो लिख रही यह पटकथा वही तो सुपात्र है"। कवि आलोक श्रीवास्तव के इस कविता पर श्रोताओं ने भी जमकर में दाग दी।

शिव तांडव के जरिए भी शिव का गुणगान
वही प्रसिद्ध कवि आलोक श्रीवास्तव ने शिव तांडव का हिंदी अनुवाद करते हुए कविता कही। उन्होंने कहा कि शिव तांडव संस्कृत में है लेकिन देश के प्रसिद्ध फिल्म एक्टर आशुतोष राणा ने शिव तांडव को सरल भाषा में करने की बात कही थी जिस पर उन्होंने शिव तांडव को सरल भाषा में करते हुए शिव तांडव का हिंदी अनुवाद किया।

जटाओं से जिनके जल प्रवाह मात्र गंग का
गले में जिनके सज रहा है हार विश्व भुजंग का
डमक डमक डमरु कह रहा शिवाय -शिवम
तरल-अनल, गगन-पवन धरा- धरा, शिवम-शिवम
सजल लहर भी हो गई चपल-चपल ललाट पर
धड़क रहा है स्वर्ण सा अनल-सकल ललाट पर
ललाट पर अर्ध्द चंद्र कह उठा शिवा-शिवम
तरल अनल गगन पवन धरा- धरा शिवम शिवम।