
कोरोना संक्रमण की महामारी के दौर में हमें कई नजारें देखने को मिल रहे हैं। मजदूर हो या फिर छात्र। कहीं ना कहीं दोनों ही वर्गो को महामारी की मार झेलनी पड़ रही है। बीते दिनों दोनों ही वर्गों को जयपुर और कोटा से रोडवेज बसों के जरिए भेजा गया। इस दौरान रोडवेज के एमडी नवीन जैन ने दोनों ही जगह मौजूद रहकर व्यवस्थाएं संभाली। इस दौरान उन्होंने कोरोना माहामारी से जूझते दोनों वर्गों की भावनाओं को अपने शब्दों में फेसबुक पर बयां किया है। इस दौरान उन्होंने अपने लेख को राजस्थान पत्रिका के साथ भी साझा किया।
नवीन जैन
पिछले दिनों कोटा में था और एक बहुत ही अजीब और दिल को अनेक तरह से कचोटने वाला मंजर देखने को मिला I उत्तर प्रदेश के अनेक शहरों के रहने वाले बहुत सारे बच्चे, जो कोटा में आकर इंजीनियरिंग या मेडिकल की कोचिंग लेने के लिए हॉस्टलों में रहते हैं, कोरोना वायरस के चलते उन्हें सरकार ने बसे भेज कर अपने-अपने शहरों तक पहुंचाने का एक बड़ा काम हाथ में लिया I भगवान द्वारा बनाए गए मानव में मैंने सबसे बड़ी चीज यही देखी है कि दुष्कर हालातों में, क्राइसिस के समय जब आधी रात को उसे लगता है कि उसकी पूरी एनर्जी छूमंतर हो गई है और थकान ने उसके शरीर और दिमाग पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया है, ऐसे में हमारे जमीर और हमारी संवेदनशीलता हमारे ऊपर आधिपत्य स्थापित कर लेती है और शायद यही सबसे सुंदर चीज है, जो आज भी दुनिया को चलायमान रखे हुए हैं।
डिपो के डीजल पंप पर खड़ा हुआ जब मैं बसों में डीजल भरते हुए देख रहा था तो उस समय छात्र-छात्राओं से भरी हुई बस की खिड़कियों से बाहर टकटकी लगाकर देखते हुए उनके उदास चेहरे पता नहीं कितनी ही प्रकार की कहानियां बयां कर रहे थे। I मुझे याद है कि मेरा बेटा भी कभी इसी प्रकार के एंट्रेंस टेस्ट की तैयारी कर रहा था।I वो अलग बात है कि वह कोटा ना जाकर मेरे पास रहकर ही यह तैयारी कर रहा था, लेकिन कहीं ना कहीं मेरे अंदर का पिता मुझे उन बच्चों के प्रति एक ऐसे अपनत्व का एहसास करा रहा था, जिसे मैं कंट्रोल भी नहीं कर पा रहा था और मेरा मन हो रहा था कि जैसे मैं किसी बस के अंदर चढ़ जाऊं और उन बच्चों से उनके उस समय के ख्यालों और जज्बातों के बारे में बात करूं I …... फिर सोचा- नहीं,नहीं-मैं इन्हें इतने बड़े सफर में अगर शुरू में ही नकारात्मकता से भर दूंगा तो इनका पूरा सफर करना मुश्किल हो जाएगा और वैसे भी मैं तो हमेशा कोशिश करता हूं कि किसी भी प्रकार की बुरी से बुरी स्थिति में भी कोई ना कोई सकारात्मकता पैदा करूँ I फिर लगा कि 120 लीटर डीजल लेने में एक बस को जितना समय लग रहा है क्या मैं अंदर जाकर इनके बीच में जोश पैदा करने के लिए या इनके बीच की थकान को या आशंकाओं को दूर करने के लिए कोई कहानी सुना दूं। I यह भी उसी दिन पता चला कि पंप की पतली नोजल से बस में 120 लीटर डीजल डालने में लगभग 3 मिनट लग जाते हैं। फिर मैंने जैसे खुद की ही खिल्ली उड़ाई कि यार कुछ ज्यादा ना हो जाए और लोग सोचें कि यह कैसा आदमी है जो रात के 12 बजे अपने डिपो के डीजल पंप पर खड़ा होकर बसों में डीजल भरते हुए देख रहा है और बच्चों को कहानियां सुना रहा है।
कई बार हम अपनी बहुत अधिक मानवता और संवेदनशीलता के अल्फाजों को अपने दिल से निकाल कर लोगों पर उड़ेलने को मानवीय भावनाओं ना मानकर “ज़बरदस्ती के इमोशंस का डेमोंसट्रेशन” समझे जाने से डर जाते हैं और अपनी भावनाओं को नहीं चाहते हुए भी नियंत्रित कर लेते हैं। I फिर हमारे वाली इस पीढ़ी को इन नए किशोर वर्ग के लोगों से यह भी डर लगता है कि यह किसी बात को पता नहीं किस तरह से समझें और फिर यह लोग अपनी भावनाओं को खुले तौर पर प्रकट करने में ज्यादा शर्माते भी नहीं है कि आप अब और परेशान मत करिए हम पहले से ही बहुत परेशान हैं। I हा हा हा... मैं बहुत बार यह फैसला नहीं कर पाता हूं कि मुझे एक अच्छा इंसान होने के लिए अपनी भावनाओं को बिना सोचे समझे केवल 'पैशनेट' होकर शेयर कर लेना चाहिए अथवा एक दुनियादारी इंसान होने के नाते अच्छा खासा कंट्रोल करते हुए अपने आपको इतना “सेंटीमेंटली एक्सपोज्ड” होने से बचा लेना चाहिए। I मैंने कई बार देखा है कि जब हम अपने जज्बातों को पूरी शिद्दत के साथ दूसरों के साथ बांट लेना चाहते हैं और अपनी आत्मा को प्रफुल्लित होते हुए महसूस करना चाहते हैं तो कुछ ना कुछ आकर रोक लेता है और फिर चाह कर भी वह नहीं कर पाते हैं जो हमारी आत्मा तो हमें करने के लिए कहती है लेकिन हमारा दिमाग बीच में आकर अच्छे से रास्ता रोक लेता है ।
और आखिर में वही हुआ। मैं ना किसी बस में चढ़ा और ना ही मैंने बच्चों के बीच में जाकर कोई कहानी सुनाई और जब मैं वापिस सर्किट हाउस में आया तो मेरे दिल ने मुझे कचोटा किया-आज तो फिर से अपनी आत्मा और दिल की आवाज़ को सुनकर कुछ ऐसा करने वाला था शायद जिसे देखकर लोग तो उसे प्रदर्शन मान लेते लेकिन तेरी आत्मा उसे दिव्य दर्शन मान सकती थी I मैं तो इस मौके पर भगवान से इतना ही कहना चाहूँगा कि सालों, महीनों, हफ्तों तक कोटा में रहकर पूरी शिद्दत से मेहनत करने वाले लोगों को उनकी करनी का अच्छा परिणाम ज़रूर देना, भगवान! क्योंकि कोरोना तो चला जाएगा लेकिन यह सब उन बच्चों के लिए जिंदगी भर का दर्दनाक चैप्टर ना बन जाए। I
जब मैं हमारे कोटा डिपो के डीजल पंप पर खड़ा हुआ यह सारे मंजर देख रहा तो अचानक मुझे याद आया कि आज से लगभग 25 दिन पहले इसी तरह की एक और एक्सरसाइज हम लोगों ने की थी I फर्क केवल इतना था कि उस दिन बसे हमारी थी और उसमें ले जाने वाले मजदूर और उनके परिवार दूसरे राज्यों के थेI मुझे उस दिन कुछ घंटों के लिए जीवन के बहुत सारे पहलू देखने को मिले थे और यकीन मानिए, इन सारे ऑब्जर्वेशन से ही शायद हमारे अंदर सेवा के भाव को ज्यादा अच्छा बनाने या उन अनुभवों को किसी प्रकार से इस्तेमाल करते हुए भविष्य के लिए कोई अच्छी पॉलिसी की दिशा में जाना या प्रबंधन के सिद्धांतों से जोड़ते हुए कोई नवाचार कर देना। इन्हीं चीजों से संभव हो जाए तो क्या बात है। I मुझे अच्छे से याद है कि रात को 11 बजे जयपुर के एक व्यस्त चौराहे पर हमारे द्वारा ट्रैफिक नहीं होने का फायदा उठाते हुए एक टेंपरेरी Bus stop का निर्माण कर लिया गया और वहां पर अपने बेड़े से वाहनों को लाकर खड़ा कर दिया गया।
तब तक वहां जमा हो गए हजारों मजदूरों को बहुत बार समझा-समझा कर किसी तरह अलग-अलग बिठा कर उनमें ज़बरदस्ती, उनका मन नहीं होते हुए भी सोशल डिस्टेंसिंग करने का प्रयास करते हुए उनकी मंजिलों के लिए एक अच्छी भावना के साथ उन्हें सही प्रकार से बसों में चढ़ाने का प्रयास किया गया और उसमें हम काफी हद तक सफल भी रहे थे और इस पूरी कवायद के दौरान बहुत सारे मार्मिक दृश्य भी देखने को मिले थे जो मैं भूल नहीं सकता। I शायद हमारे बहुत सारे हिंदी साहित्यकारों ने ग्रामीण भारत पर बनी हुई अपनी कहानियों में जिस तरह के किरदारों को इस्तेमाल किया है उनमें से काफी सारे किरदार उस दिन जयपुर की सड़कों पर मुझे चलते हुए नजर आ रहे थे। I आखिर में इस तरह के ग्लोबलाइजेशन का क्या फायदा है जिसमें किसी एक देश में पैदा हुआ एक जानलेवा वायरस किसी दूसरे देश में आकर ऐसे ऐसे लोगों की जिंदगी में तबाही ला देता है जिनका ना तो उस देश से कोई लेना-देना है और ना ही उस वायरस से कोई लेना देना। बेचारा वह तो किसी तरह से जन्म लेने के बाद तरह तरह के हालातों का शिकार होने के बाद कहीं पर दोस्तों के साथ या रिश्तेदारों के कहने पर या फिर ठेकेदार की भीड़ में शामिल होकर मजदूरी करने के लिए जाता है। एक परिवार बना लेता है। कुछ बच्चे हो जाते हैं और फिर धीरे-धीरे कुछ चीजें जमा कर लेता है। चाहे वह मिट्टी ढोने वाला तसला-तगारी हो या फिर मालिक की घर या दुकान में पेंट का काम पूरा होने के बाद बची हुई प्लास्टिक की बाल्टी जिसे वह नहाने के लिए इस्तेमाल कर लेता है।
I कुछ लोग तो उनके द्वारा शायद अगले दिन के खाने के लिए जोड़ी गई सूखी लकड़ियां भी सिर पर लादे चल रहे थे। यहां तो ठिकाना भी नहीं था कि उन्हें कहीं खाना बनाने के लिए राशन मिलेगा या नहीं मिलेगा लेकिन शायद उनकी आंखों से यह उम्मीद नहीं गई थी कि हो सकता है। कहीं ना कहीं से मिल जाए तो उसकी मदद से कुछ पकाकर बच्चों को खिला देंगे।I देश का बड़े से बड़ा धनवान आदमी हो या कितना छोटे से छोटा गरीब मजदूर हो उनकी उम्मीदें कभी खत्म नहीं होती है और शायद यह उम्मीद ही है जो इस जीवन को लगातार चलाती रहती है।I मैंने उन लोगों को बहुत बार यह कहा कि हमारी बस में हमें ज्यादा सवारियां लेकर जानी है तो हम आपका यह सारा छोटा-छोटा सस्ता सामान लेकर नहीं जा पाएंगे तो मैंने देखा कि मजदूरों का एक ग्रुप मुझसे नाराज होकर कोने में बैठ गया। जिसका यह मानना था कि वह अगर बस में जाएंगे तो अपनी इन लकड़ी पेंट के खाली प्लास्टिक के डिब्बे और अपने काम की निशानी तगारी को लेकर ही जाएंगे नहीं तो उन्हें बस में मुफ्त का सफर नहीं करना है।
I एक परिवार में आदमी के सिर पर बड़ा सा संदूक था, उसके साथ में चल रही उसकी पत्नी की गोद में एक बच्चा था और शायद एक बच्चा पेट में भी थाI एक 5 साल का बच्चा साथ साथ चल रहा था जिसके सिर पर भी एक छोटी सी गठरी रख दी गई। I मैंने अपनी गाड़ी से सिर बाहर निकाल कर पूछा कहां जाओगे तो उसने कहा एमपी। I मैंने कहा एमपी बॉर्डर के लिए बसें थोड़ी आगे से मिलेगी, आप आ जाओI उसका अब मुझसे सवाल करने का टाइम था और उसने मुझसे पूछा कि बस कितनी आगे मिलेगी? मैंने उत्सुकता से पूछा कि तुम कितना चल चुके हो तो अपनी पत्नी की तरफ देखते हुए उसने कहा कि कितने मील चला हूं यह तो मुझे नहीं पता है लेकिन कल शाम से चल रहा हूं। I उसके इस जवाब में भी मेरे लिए बहुत सारे सवाल थे।
कोरोना वायरस के कारण तो सारे ही राज्यों में काम ठप हो रखा है। अगर यह अपने राज्य में पहुंच भी गया तो अपने गांव में पहुंच कर भी यह आखिर अपने परिवार को खिलाएगा क्या? उसकी पत्नी जो कि समय पेट से है यह किस तरह से इसकी सुरक्षित डिलीवरी इन हालात में कराएगा, यह सोचकर ही डर लग रहा था। I लेकिन वह आदमी अपने परिवार को किसी तरह इन हालात से निकालने के हौसले के कारण लगातार चले जा रहा था और उसका बच्चा कोशिश कर रहा था कि वह अपने माता-पिता की स्पीड से चाल मिलाकर उनके साथ आगे बढ़ सकेI। उस 5 साल के बच्चे ने अपनी आने वाली जिंदगी के लिए सपने देखे होंगे यह तो मैं सोच ही नहीं सकता।I जब वह थोड़ा बड़ा होकर स्कूल जाएगा तो भी वह कुछ बड़ा सोच पाएगा कि नहीं सोच पाएगा मैं यह भी नहीं जानता।
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आज मैं जिन 15 से 18 साल के बच्चों को सरकारी बसों में बैठकर अपने घर की तरफ जाते हुए देख रहा हूं तो बहुत अच्छा तो नहीं लग रहा है। लेकिन दिमाग में बहुत सारी बातें आ रही हैं।I मन में यह विचार भी आया कि शायद इनमें से ज्यादातर बच्चे तो फ्लाइट से या फिर अपनी कार से किया अच्छी टैक्सी के माध्यम से ही कोटा आते जाते होंगे और शायद बहुत से लोगों ने काफी समय से पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल भी नहीं किया होगा और आज इस बस में बैठते हुए शायद इन्हें सबसे बड़ा सुकून इसी बात का है कि यह अपने घर पहुंच जाएंगे ।
I हालात एक परिवार को सैकड़ों किलोमीटर चलने की ताकत दे देते हैं तो फिर इन बच्चों को बस में बैठने के लिए तैयार तो कर ही लेंगे I क्या मैं इनकी तुलना आज से 25 दिन पहले जयपुर की सड़क पर चल रहे उस 5 साल के बच्चे से कर सकता हूं ? कुछ लोगों को मेरा सवाल भी तू का भी लग सकता है और कुछ लोगों को मेरा सवाल सुनकर मंथन करने का मौका भी मिल सकता है। अगर हम इन दोनों वर्गों की आपस में सामाजिक और आर्थिक रूप से तुलना करेंगे तो अनेक प्रकार के फर्क नजर आएँगे। I
एक तरफ रोजी-रोटी की तलाश में आए हुए वह लोग हैं जो फैक्ट्रियों, दुकानों और खेतों में जाकर अपने परिवारों के साथ रहकर मेहनत करते हुए किसी तरह से अपने जीवन को बिता रहे हैं और अचानक एक त्रासदी हुई है जिसके बारे में उन्हें उतना ही पता है। जितना उन्हें बताया गया है ।I सही कहूं तो सड़क पर जगह-जगह खड़ी हुई पुलिस और पूरी तरह बंद पड़ी हुई मार्केट ही वह सबसे बड़े इंडिकेटर हैं जिनसे उन्हें यह पता लगा है कि कुछ ऐसा घटा है, जो नहीं होना चाहिए था और इसी कारण उन्हें अचानक अपने अपने टेंपरेरी घोंसलो से निकलना पड़ा है।I दूसरी तरफ वे बच्चे हैं जिन्हें अभी रोजी-रोटी तुरंत तो नहीं कमानी है लेकिन वे चाहते हैं कि जीवन में कुछ ऐसा बन जाए जिससे कभी रोजी रोटी की चिंता ही नहीं करनी पड़ी और इसीलिए अपने घरों से हजारों किलोमीटर दूर आकर कोचिंग सेंटर्स के जरिए भारत के बड़े-बड़े एंट्रेंस टेस्ट की तैयारी में लगे हुए हैं और इनमें से ज्यादातर लोग मध्यम वर्ग के परिवारों से होने के कारण मोबाइल या इंटरनेट और अन्य माध्यम से दुनिया में कोरोनावायरस के माध्यम से हो रही सारी उथल पुथल को देख रहे हैं।
I यह सही है कि इन्हें अपने अपने घर पहुंचने के बाद पेट भरने की चिंता नहीं करनी है लेकिन भविष्य के बारे में जो आशंका मजदूर की आंखों में दिखाई दे रही है वही चीज इन के दिलों में भी धुकधुकी मचा रही है। I अपने परिवार के साथ भारी कदमों से सड़क पर चलते हुए मजदूरों के दिल में बार-बार इस बात का ख्याल आता है कि किसी तरह से इस साल ठीक-ठाक मजदूरी का इन्तज़ाम हुआ था और कुछ मेहनत कर भी ली थी। I विडंबना की बात है कि ठीक उसी तरह का एक विचार इन कोचिंग स्टूडेंट्स के जेहन में भी आता होगा कि बड़ी मुश्किल से किसी सेंटर या सर से अब चीजें समझ में आना शुरू हुआ था और इस साल के टेस्ट में मैं अच्छा कर सकता था। I हाड़ तोड़ मेहनत करते हुए भी इंसान कहीं ना कहीं अपने लिए एक कंफर्ट जोन बना ही लेता है और इससे बाहर निकलते हुए दुख तो होता ही है।
I यह बात भी उल्लेखनीय है कि हर संकट का कहीं ना कहीं एक अंत नजर में होता है लेकिन यहां एक बहुत ही अलग तरह का पहली बार एक संकट आया है, जिसने हर तरह से इंसान को अविश्वास करना सिखा दिया है और वह अपने खुद के सेफ्टी के लिए बहुत ज्यादा आशंकित हो गया है। I मज़दूर हो या इस देश का युवा अथवा कोई भी किसी भी वर्ग से संबंध रखने वाला कोई भी नागरिक हो, इस परीक्षा की घड़ी में हम में से केवल वही बहुत अच्छे से बाहर निकल कर आ पाएंगे जो अभी फिलहाल घड़ी को उठाकर अलमारी में बंद कर देंगे और एक ऐसी जीवनशैली अपनाएंगे जिसमें हम कोरोना वायरस के अंतिम रूप से खत्म होने तक जीवन को मर्यादा और संतुलन के साथ जीने का हुनर सीख जाएंगे। I हम सब भगवान के हमें दिए हुए अनमोल पल टुकड़ों में ही सही, पर वापस तो लेंगे और फिर मिलकर इंसान के अंदर रहने वाले जज़्बे को जगा लेंगे और कोरोना के बिना या कोरोना के साथ दोनों ही हालात में, अपने सपनों को फिर से देखेंगे और मंज़िल की तरफ कदम बढ़ा देंगेI।
#haaregacorona #jeetegainsaan
Updated on:
25 Apr 2020 08:59 pm
Published on:
25 Apr 2020 08:49 pm
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