
जयपुर . दुनिया में गुलाबी नगरी के रूप में प्रख्यात अपने इस शहर के संस्थापक और महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय को जन्म लिए 330 बरस बीत चुके हैं। अब से करीब 290 साल पूर्व 18 नवम्बर 1727 में जयपुर की रूपरेखा उनके नाम पर तैयार हुई थी। जिसकी खूबसूरती को सजाने और संवारने में आम नागरिक से लेकर दीवान तक ने उनका सहयोग किया। 3 नवंबर 1688 में जन्मे महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने मुगलों व मराठाओं के हमलों से प्रजा को सुरक्षित बनाए रखने हेतु 17वीं सदी में आमेर से 10—12 किमी की दूरी पर शहर बसाने की सोची। विशाल और सुंदर सजावट से भरपूर शहर बसाने के उनके सपने को पूरा करने हेतु 19 जून 1942 को सर मिर्जा इस्माइल प्राइम मिनिस्टर बना कर रियासत में लाए गए। इन्होंने राजनीतिक उठापटक से शहर को दूर रखा। जिसके उपरांत जयपुर को खूबसूरत बनाने की ऐतिहासिक निर्माण—यात्रा शुरू हुई।
जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह की 330वीं जयंती के मौके पर शाही दस्तावेजों से जयपुर के बसने की कहानी। उस दौर में जब आमेर के तत्कालीन महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय नाहरगढ़ शिकार के लिए आए थे तभी उन्हें जयपुर बसाने का विचार आया था। इस जगह आमेर के तत्कालीन राजा अक्सर शिकार खेलने जाते थे। नगर बसाने से पहले जयसिंह ने ताल कटोरा के नाम से तालाब चौकोर बनवाया और नाहरगढ़ में शिकार की ओदी (मचान) के स्थान पर बादल महल बनवाया। जय निवास उद्यान और सूरज महल बनवाया जिसमें राधा गोविंददेवजी को कनक वृंदावन से लाकर विराजमान किया। तीन तरफ पहाडि़यों से घिरे स्थान को सुरक्षा के लिहाज से सही मानते हुए नया जयपुर बसाने का निर्णय किया। स्थापना का यह दिन था 18 नवम्बर 1727 ई. हालांकि, इसके कुछ वर्षों बाद 21 सितंबर 1743 में उनकी मृत्यु हो गई।
उनके बाद सवाई प्रताप सिंह से लेकर सवाई मान सिंह द्वितीय तक कई राजाओं ने शहर को बसाया। 20वीं सदी के मध्य में जयपुर रियासत के दीवान रहे सर मिर्जा इस्माइल का शहर की खूबसूरती को सजाने और संवारने में अहम रोल रहा। उन्हें उस समय पीएम के तौर पर देखा जाता था। शहर में आज उनके नाम से एक मार्ग बड़ा प्रसिद्ध है, जिसे एमआई रोड (सर मिर्जा इस्माइल रोड) कहते हैं।
आजादी से पहले सवाई मान सिंह द्वितीय जयपुर के राजा थे। सेनापति होने के साथ ही वे अंग्रेजी के अच्छे जानकार भी थे। मेयो कॉलेज अजमेर में पढ़े, वूलविच की रॉयल मिलिट्री एकेडमी में भी ट्रेनिंग ली। 1911 में वे यहां राजा बने, 1932 में पूरी तरह बालिग होने पर उन्हें पूरे राज्य का अधिकार मिल गया। इसके बाद उन्होंने मैसूर रियासत के दीवान सर मिर्जा इस्माइल को जयपुर का दीवान बनने का न्योता दिया। 19 जून 1942 में वे रियासत में लाए गए। मिर्जा इस्माइल आगा जान के बेटे थे और मैसूर के सेंट बेटरिक स्कूल में पढ़े थे। साथ ही विचारधारा उदार थी, और कम्यूनल नहीं थे।
पद संभालते ही मिर्जा इस्माइल ने जयपुर में रामनिवास बाग में जंगली पेड़ों को कटवा कर करीने से सड़कें बनवाईं। चौड़ा रास्ता में नया दरवाजा निकाला जो आज रामनिवास बाग के सामने है। पहले यहां बंद परकोटा था। इसमें दरवाजा निकालते ही त्रिपोलिया से लेकर म्यूजियम यानी अल्बर्ट हॉल तक का दृश्य साफ दिखाई देने लगा। शहर में सारी दुकानों को करीने से बनवा कर उनपर नाम लिखवाए गए। उनके सबसे बड़े कामों में सी-स्कीम का बनवाया जाना। स्टैच्यू सर्किल के निर्माण के अलावा परकोटे से बाहर की कई बस्तियों में पूरी बसावट करना आदि शामिल है। मिर्जा की सवाई जयसिंह के सपने को पूरा करने में काफी भूमिका रही। हालांकि, उनके बाद भी कई लोगों ने इस पर काम किया. (By Vijay Ram)
Published on:
04 Nov 2017 05:31 pm
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