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क्या आपको भी फोन कॉल से डर लगता है? जानिए क्या है टेलीफोबिया

विशेषज्ञ बोेले, टेलीफोबिया से डरें नहीं, इसे छुटकारा पाएं, रिश्तों और ऑफिस कम्युनिकेशन पर पड़ रहा प्रभाव

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AI जनरेटेड प्रतीकात्मक तस्वीर

जयपुर. मैसेज पर 'हाय' लिखना आसान है, लेकिन फोन पर 'हैलो' कहना मुश्किल हो गया है। कॉल आते ही कुछ लोग घबराने लगते हैं, मानो कोई परीक्षा देनी हो। यही है टेलीफोबिया यानी फोन एंग्जाइटी। डिजिटल लाइफस्टाइल ने हमें सोच‑समझकर जवाब देने का आदी बना दिया है, लेकिन रियल‑टाइम बातचीत अब बोझ लगने लगी है। राजधानी जयपुर के सरकारी और निजी मनोचिकित्सा केंद्रों में टेलीफोबिया से जुड़े मामले सामने आ रहे हैं। फिलहाल ऐसे मामलों की संख्या कम है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल लाइफस्टाइल के चलते आने वाले समय में इसमें बढ़ोतरी हो सकती है।

कॉल पर गलत बोलने या जज किए जाने का डर

मनोरोग विशेषज्ञों के अनुसार टेलीफोबिया की सबसे बड़ी वजह कुछ गलत बोल देने या जज किए जाने का डर है। फोन कॉल पर सामने वाले के चेहरे के हाव-भाव नजर नहीं आते, जिससे व्यक्ति असहज महसूस करता है। पुराने खराब कॉल अनुभव, तुरंत जवाब देने का दबाव, मैसेजिंग की आदत के कारण लोगों की कॉल पर बातचीत करने की स्किल कमजोर होती जा रही है, जिससे फोन कॉल और ज्यादा मुश्किल लगने लगी है।

कोविड और वर्क फ्रॉम होम का असर

विशेषज्ञ बताते हैं कि कोविड काल के दौरान बातचीत डिजिटल मोड पर ज्यादा हो गई थी। वर्क फ्रॉम होम के चलते आमने-सामने संवाद कम हुआ और फोन व वीडियो कॉल अचानक बढ़ गए। सोशल मीडिया, चैटिंग ऐप्स ने लोगों को सोच-समझकर जवाब देने का आदी बना दिया। नतीजतन रियल-टाइम बातचीत भारी लगने लगी और यही आदत आगे चलकर टेलीफोबिया में बदलने लगी। यह समस्या खासकर युवा पीढ़ी में तेजी से बढ़ रही है।

यूं पहचानें टेलिफोबिया के लक्षण

-फोन की घंटी बजते ही घबराहट।
-कॉल देखते ही तनाव बढ़ना।
-कॉल से पहले पसीना आना या हाथ कांपना।
-कॉल टालना या मिस्ड कॉल का जवाब न देना।
-कॉल के बाद थकान महसूस होना।

ये नुकसान भी झेलने पड़ रहे

रिश्तों में गलतफहमियां
इमोशनल बातें सही तरह नहीं पहुंच पातीं
ऑफिस में कम्युनिकेशन गैप
टीमवर्क और प्रोफेशनल ग्रोथ प्रभावित
आत्मविश्वास में कमी

एक्सपर्ट व्यू: व्यवहारिक थैरेपी से इलाज संभव

किसी भी प्रकार का अनावश्यक डर फोबिया कहलाता है। टेलीफोबिया की समस्या पहले से मानसिक तनाव झेल रहे लोगों में ज्यादा देखी जाती थी, लेकिन अब हर कोई शिकार हो रहा है। बिहेवियर थैरेपी और एक्सेप्टेंस एंड कमिटमेंट थैरेपी से इसका इलाज संभव है। धीरे-धीरे कॉल की आदत डालने और जरूरत पड़ने पर प्रोफेशनल मदद से व्यक्ति सामान्य स्थिति में लौट सकता है।

डॉ. ललित बत्रा, वरिष्ट मनोरोग विशेषज्ञ व अधीक्षक, मनोचिकित्सा केंद्र जयपुर