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प्रदेश में हर वर्ष बढ रहे हैं इसके शिकार, चार साल में 449 लोग गंवा चुके हैं जान

सर्वाधिक प्रभावित जिले : जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर और अलवर

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शादाब अहमद / जयपुर। सरकार की लापरवाही और दो विभागों में समन्वय की कमी के चलते प्रदेश में सिलिकोसिस बीमारी खतरनाक होती जा रही है। जहां 2013-14 में इस बीमारी से ग्रस्त 304 मरीज थे, वो चार साल में बढ़कर 4931 हो गए और इसके चलते चार साल में 449 मरीजों की मौत भी हो गई। सीएजी रिपोर्ट में इस पर चिंता जाहिर की गई है।

प्रदेश में बड़े पैमाने पर पत्थर खनन के साथ क्रेशर, सैंड, ब्लास्टिंग, ढुलाई, सिरेमिक उद्योग, रत्न काटन एवं चमकाने, स्लेट-पैंसिंल निर्माण, कांच उत्पाद का कार्य होता है। इस तरह के कार्य में लगे लाखों मजदूरों के हर पल सांस के साथ सिलिका शरीर के अंदर प्रवेश करता है। इसके चलते उनमें सिलिकोसिस बीमारी पनपने का खतरा बना रहता है। सीएजी ने चिकित्सा विभाग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए प्रदेश में इसकी भयावाह स्थिति बताई है। इसके साथ ही मजदूरों की जिंदगी दांव पर लगी होने के बावजूद इस बीमारी को नियंत्रित करने के लिए मजबूत योजना शुरू नहीं की गई। यही वजह है कि प्रदेश में जहां 2013-14 में इस बीमारी से सिर्फ एक मजदूर की मौत हुई थी, वही 2016-17 में यह संख्या 235 हो गई।

नहीं बन सका उडऩ दस्ता

मानवाधिकार आयोग की सिफारिश के अनुसार खान विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों को शामिल करते हुए उडऩ दस्ते का गठन करना था। खान विभाग की ओर से मुख्य सचिव, खान विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों को इसके लिए जनवरी 2015 में पत्र लिखा गया, लेकिन इसका गठन नहीं हुआ।

बीमारी के लक्षण : धूल कणों के लगातार सांस के साथ शरीर में जाने से मरीज के सीने में दर्द, खांसी और सांस में तकलीफ होती है। धीरे-धीरे मरीज का वजन कम होने लगता है। खांसी में खून आने या इंफ्केशन होने से कई बार मरीज की मौत हो जाती है।

यह है बचाव के उपाय
-सिलिकोसिस से खतरे वाले कार्य में लगे मजदूरों को मास्क पहनकर कार्य करना चाहिए।

-वेट ड्रिलिंग अपनाए-ड्रिल का उपयोग डस्ट एक्सट्रेक्टर के साथ संचालित करके या फिर पानी के इंजेक्शन प्रणाली का उपयोग करना-घड़ाई कार्य में पानी का छिड़काव