
बाड़मेर
रेगिस्तान में भीषण गर्मी में जब अधिकतम तापमान 50 डिग्री तक पहुंच जाता है तब भी एकमात्र जाल ही ऐसा वृक्ष है जो हरा-भरा और घना दिखाई देता है। यह तेज गर्मी में मरुधरा को प्रकृति का एक वरदान ही कहा जा सकता है। बहुपयोगी पेड़ पर गर्मी के मौसम में लगने वाले फल पीलू ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े चाव के साथ खाए जाते है। अब तो यह बाजार में भी बिक्री के लिए आते है। पीलू लाल-गुलाबी रंग के होते हैं।
जाल वृक्ष की मरुधरा क्षेत्र में दो प्रजातियां पाई जाती है। सामान्य भाषा में खारा तथा तथा मीठा जाल के नाम से जाना जाता है। वानस्पतिक भाषा में खारे सैल्वेडोरा ओलिओइडीज तथा मीठे जाळ को सैल्वेडोरा पर्सिका कहा जाता है। वृक्ष के बीजों से प्राप्त तेल का उपयोग औषधियों में होता है। मीठे जाल की टहनियों का उपयोग पम्परागत दातुन के रूप में भी किया जाता है।
प्रतिकूल परिस्थितियों में मरु प्रदेश की जैवविविधता संरक्षण में वृक्ष का सबसे महत्वपूवर्ण योगदान है। मध्यम आकार के हरे-भरे एवं सघन शाखाओं युक्त होने के कारण अत्यधिक गर्मी के मौसम में जीव-जन्तुओं, पक्षियों तथा कीट-पतंगों का आश्रय स्थल भी है। वृक्ष का तना दरारों युक्त होने के कारण इसमें सरीसृप भी निवास करते हैं। वहीं घने होने के कारण गर्मी में छाया भी मिलती है।
यहां हैं सबसे ज्यादा
मरुभूमि के जालोर, जैसलमेर, बाड़मेर, पाली, जोधपुर आदि जिलों में जाल के वृक्ष बहुतायत से पाए जाते हैं। ग्रामीण के साथ शहरी क्षेत्र में भी जाळ के पेड़ मिल जाते है। वृक्ष का कुल सैल्वेडोरेसी है। इस फल को देसी अंगूर भी कहा जाता है। यहां के आम और ख़ास सभी इसे बड़े चाव से इसे खाते हैं। घर आये मेहमानों के सामने इसे परोसा जाता है और एक दूसरे को उपहार स्वरुप भी दिए जाते हैं।
रेगिस्तान का वरदान
राजकीय महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के आचार्य डॉ. रिछपाल सिंह बताते हैं कि जाल का वृक्ष रेगिस्तानी इलाकों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। गर्मी के दिनों में जब तापमान 50 डिग्री तक पहुंच जाता है तब भी यह हरा-भरा रहने के साथ फल देता है। साथ ही जैव विविधता संरक्षण में पेड़ काफी महत्वपूर्ण है। जाळ के पेड़ घने होने से छायादार भी होते है।
Published on:
05 May 2022 03:49 pm
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