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मोगली को आसरे के दीये की आस

मोगलीÓ मरणासन्न हालत से ही नहीं, बीमारी से भी काफी हद तक उबर चुका है। मां के सहारे पांवों पर खड़ा होने और बिना सहारे बैठने लगा है। गत 19 अक्टूबर से एमबी अस्पताल में भर्ती मोगली को स्वस्थ देख डॉक्टर छुट्टी देना चाहते हैं लेकिन बेसहारा मोगली आखिर जाए तो कहां जाए? उसके हितचिन्तकों ने बताया कि काश, उसे आसरा दे कोई ठौर-ठिकाना उपलब्ध करा दे। ताकि, उसे फिर से वन्यजीवों की तरह जीवन जीने खुली पहाड़ी पर न जाना पड़े।

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jitendra saran

Nov 13, 2015

मोगलीÓ मरणासन्न हालत से ही नहीं, बीमारी से भी काफी हद तक उबर चुका है। मां के सहारे पांवों पर खड़ा होने और बिना सहारे बैठने लगा है। गत 19 अक्टूबर से एमबी अस्पताल में भर्ती मोगली को स्वस्थ देख डॉक्टर छुट्टी देना चाहते हैं लेकिन बेसहारा मोगली आखिर जाए तो कहां जाए? उसके हितचिन्तकों ने बताया कि काश, उसे आसरा दे कोई ठौर-ठिकाना उपलब्ध करा दे। ताकि, उसे फिर से वन्यजीवों की तरह जीवन जीने खुली पहाड़ी पर न जाना पड़े।
अस्पताल में रहकर मोगली बिस्किट, बे्रड आदि खाना, दूध पीना सीख गया है। दवा लेने और देखभाल से उसकी सेहत में तेजी से सुधार हुआ है। खुद उठकर बैठ जाता है, मां के सहारे से चल भी लेता है। हालांकि उसे अभी नियमित तौर पर दवाएं लेनी पड़ेंगी लेकिन डॉक्टरों ने बताया कि उसे 'घरÓ ले जाया जा सकता है।
समाज से उम्मीद
समाजसेवी गजेन्द्रसिंह खालसा, जीतेंद्रसिंह राठौड़, शीतल सनाढ्य, कौशल नागदा, अफरोज का कहना है कि मां-बेटा को आश्रय उपलब्ध कराने के लिए प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थाओं को आगे आना चाहिए।
16 अक्टूबर: गुलाबबाग-दूधतलाई मार्ग पर दुकानदारों, ऑटो चालकों में खुसर-फुसर शुरू हुई कि मोगली 15 दिन से दिखा नहीं, गया कहां?
17 अक्टूबर : खैर-खबर लेने कुछ समाजसेवियों ने पहाड़ी पर चढऩे का प्रयास किया लेकिन मोगली की मां चुन्नी ने पत्थर फेंकने शुरू कर दिए। खतरा यह भी था कि चुन्नी अपने पाले हुए 8-10 कुत्ते पीछे न छोड़ दे।
18 अक्टूबर : राजस्थान पत्रिका को मामले का पता चला। पत्रिका की टीम पहाड़ी पर चढ़ी तो मोगली खुले में मरणासन्न पड़ा था।
19 अक्टूबर : राजस्थान पत्रिका ने प्रशासन, समाजसेवियों का ध्यान आकृष्ट किया कि मोगली पहाड़ी पर मरणासन्न पड़ा है। इस पर सुबह ही कुछ समाजसेवी जुटे, एम्बुलेंस बुलाई और मोगली को अस्पताल पहुंचाया।
23 अक्टूबर : अस्पताल में कुछ कर्मचारियों के रवैये से घबराई चुन्नी मुंह अंधेरे कंधे पर मोगली को उठा गिरती-पड़ती 7 घंटे में ब्रह्मपोल जा पहुंची। राजस्थान पत्रिका ने उसे खोजा, फिर से अस्पताल पहुंचाया। देखभाल के लिए नारायण सेवा संस्थान आगे आया और दिन-रात के लिए दो सेवादार तैनात किए।
अब : अस्पताल में उपचार और सेवादारों की देखभाल से मोगली की हालत में सुधार हुआ। बीमारी से वह उबर चुका है लेकिन संकट यह है कि अस्पताल से छूटे तो जाए कहां? उसे अस्पताल पहुंचाने वाले समाज सेवी चाहते हैं कि मां-बेटा को कहीं आसरा मिल जाए। ताकि पहाड़ी पर नारकीय जीवन जीने को विवश न होना पड़े।
मरणासन्न पड़ा था पहाड़ी पर
लगभग 35 साल पहले मोगली जब 6-7 महीने का था, उसे गोद में लिए उसकी बेसहारा मां माछला मगरा की पहाड़ी पर चढ़ी और वहीं रहने लगी। मोगली वहीं रहकर वन्यजीवों की भांति पला-बढ़ा। उसे बोलना नहीं आता। कोई कुछ बोले तो समझ भी नहीं पाता। उसकी मां चुन्नी भी मानसिक रूप से कमजोर है। दोनों कभी-कभार पहाड़ी से उतरते, लोगों से मिली खाने-पीने की चीजें ले वापस पहाड़ी पर चले जाते।