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मुंशी प्रेमचंद ने गांव को जीया, तब लिखीं कालजयी कहानियां

-जवाहर कला केन्द्र के रंगायन सभागर में संवाद प्रवाह में हुई प्रेमचंद की कहानियों पर बात

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जयपुर

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Mohmad Imran

Aug 01, 2023

मुंशी प्रेमचंद ने गांव को जीया, तब लिखीं कालजयी कहानियां

मुंशी प्रेमचंद ने गांव को जीया, तब लिखीं कालजयी कहानियां

जयपुर। जवाहर कला केन्द्र रंगायन सभागार में सोमवार को मुंशी प्रेमचंद की कहानियों के किरदार शब्दों की उंगलियां थामे सुनने वालों के जेहन में उतरते चले गए। अवसर था राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ और जवाहर कला केन्द्र के प्रयास कला संसार के अंतर्गत मुंशी प्रेमचंद जयंती समारोह के आयोजन का। दो अलग-अलग सत्रों में साहित्यकारों ने प्रेमचंद के साहित्यिक योगदान पर चर्चा और कहानियां पढ़कर सुनाईं।

गांधी के गांवों को प्रेमचंद ने कहानियों में ढाला
'प्रेमचंद की विरासत के मायने' विषय पर पहले सत्र में चर्चा करते हुए राजस्थान विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर विशाल विक्रम सिंह ने कहा, 'प्रेमचंद नवजागरण के दौर के ऐसे लेखक हैं, जो सौ साल बाद भी दुनिया को देखने और समाज को समझने के लिए आंख की तरह हैं। आज की समस्याओं और समससामयिक मुद्दों पर उन्होंने एक सदी पहले ही अपनी कहानियों के माध्यम से हमें आइना दिखा दिया था। वह जाते हुए सामंतवाद और आते पूंजीवाद को न केवल देख रहे थे, बल्कि अपनी कहानियों के माध्यम से उसका विश्लेषण भी कर रहे थे। 'नमक का दारोगा' में वह यह बताते हैं कि दौलतमंद के यहां ईमानदार आदमी को काम करने के लिए विवश होना पड़ता है। प्रेमचंद उस दौर के अकेले ऐसे हिंदू लेखक हैं, जिनके यहां मुसलमान पात्र भी अपनी पूरी गरिमा के साथ प्रकट हुए हैं। वह दया के पात्र नहीं हैं बल्कि एक नागरिक के रूप में हमारे सामने आते हैं। उनकी कहानी 'कर्बला' में वह संभवत: पहले ऐसे लेखक हैं, जिन्होंने इमाम के शानदार व्यक्तित्व को प्रस्तुत किया है। सांप्रदायिकता से बाहर निकलने का रासता भी उनकी कहानियों में निहित है। उन्होंने 1921 में ही कहा था कि हिंदू और मुस्लिम समुदाय से जुड़ी समस्याओं को अगर सावधानी से न सुलझाया गया तो यह भारत के स्वराज के लिए दिक्कतें पैदा होंगी। गांधी ने जिन गावों की बात कि उनका वास्तविक ताना-बाना प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में पेश किया। वे प्रामाणिक सामाजिक इतिहासकार थे।

प्रेमचंद ने बनारस के पास लमही गांव में रहकर अपना साहित्य लिखा है। वह जिन लोगों और समाज के बीच रहते थे, उन्हीं को अपनी कहानियों का हिस्सा बनाया, इसलिए उनकी कहानियां आज भी इतनी प्रासंगिक और जीवंत लगती हैं। बिना गांव में रहे वहां की झलक तो आ सकती है, उसका यथार्थ नहीं आ सकेगा। प्रेमंचद ने गांव के यथार्थ को समझा और आज के समकालीन कहानीकारों का गांव का अनुभव कम हो गया है, इसलिए अब गांव हमारी कहानियों से विस्मृत होने लगा है।'
सत्र में मनीषा कुलश्रेष्ठ, डॉ. राजाराम भादू ने प्रेमचंद के साहित्यिक योगदान पर चर्चा की। भादू ने कहा, 'प्रेमचंद की रचनाएं आज भी मशाल बनकर साहित्यकारों और समाज का मार्ग प्रशस्त कर रही है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की विरासत को समग्रता में देखने की जरुरत हैए वे हिंदी के पहले ऐसे लेखक हैं जिन्होंने यथार्थवाद और गांवों को अपनी रचनाओं में स्थापित किया। उनकी रचनाओं में समाज में अंतिम छोर के व्यक्ति को बतौर नायक दिखाया गया, इतना ही नहीं रचनाशीलता में वैचारिक प्रतिबद्धता को भी उन्होंने ही जगह दी।' मनीषा कुलश्रेष्ठ ने कहा कि प्रेमचंद ने पात्रों को गढऩे में पूरी मनोवैज्ञानिक समझ का उपयोग किया। उनकी रचनाएं व्यक्ति को समाज और समाज को राष्ट्र से जोड़ती हैं। दूसरे सत्र 'कहानी के नए स्वर' में कविता मुखर, उमा, उषा दशोरा, उजला लोहिया ने अपनी कहानियां पढ़ीं। वहीं, तसनीम खान, राजाराम भादू, नितिन यादव और प्रमोद पाठक ने उन कहानियों की समीक्षा की।