
जयपुर। प्रदेश में अरबों रुपए की नजूल संपत्तियां धूल खा रही हैं। ना तो इनका बेचान हो पा रहा है और ना ही इन्हें निकायों को हस्तांतरित किया गया है। जबकि कैबिनेट सब कमेटी इस संबंध में फैसला कर चुकी है। पूरे प्रदेश में करीब 496 नजूल संपत्तियां हैं। संपदा विभाग ने खुद माना है कि राज्य के विभिन्न जिलों में कुछ नजूल संपत्तियां ऐसी हैं जिनका वर्तमान में उपयोग नहीं हो रहा है या वो खाली पड़ी हैं। विभाग ने यह भी साफ किया है कि ऐसी रिक्त नजूल संपत्तियां जिनका उपयोग राजकीय एवं सार्वजनिक हित में नहीं हो सकता। ऐसी नजूल संपत्तियों को खुली नीलामी से विक्रय करने का प्रावधान है। जिला कलेक्टरों से प्रस्ताव प्राप्त होने पर राज्य सरकार द्वारा आवश्यक निर्णय लिया जाकर तद्नुसार कार्रवाई की जाती है।
जयपुर जिले में 41 संपत्तियां
जयपुर जिले की बात की जाए तो यहां बरसों पुरानी करीब 41 नजूल संपत्तियां हैं। इन संपत्तियों पर बरसों से लोग रह रहे हैं। इसी तरह सर्वाधिक संपत्तियां करौली में 138 हैं। इसके बाद भरतपुर में 82 और अलवर में 68 नजूल संपत्तियां हैं। सबसे ज्यादा नजूल संपत्तियां भरतपुर संभाग में है।
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क्या होती है नजूल संपत्तियां
पूर्व राज परिवारों के यहां काम करने वाले लोगों को रहने के लिए जो संपत्तियां दी गई थी, उन्हें नजूल संपत्तियों कहा जाता है। बरसों पुरानी इन संपत्तियों पर पीढ़ी दर पीढ़ी राज परिवार के पूर्व सेवादार के परिवार काबिज है, लेकिन उन्हें सरकार की ओर से आवंटन नहीं किया गया।
यूं होता है आवंटन
सरकार ने नजूल संपत्तियों के आवंटन का नियम बना रखा है। नजूल निस्तारण नियम के तहत ऐसी सम्पत्तियों को किराएदार, कब्जेधारी और शरणार्थी को विक्रय करने का प्रावधान है। ऐसी नजूल भूमि पहले नगरीय निकायों को स्थानांतरित होगी। इसके बाद संबंधित काबिज व्यक्ति को निर्धारित दर पर दी जाएगी। इनका आवंटन डीएलसी दर के 20 से 50 प्रतिशत दर पर हो सकेगा।
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यूं बने हैं नियम
—वर्ष 1971 में तत्कालीन सरकार ने नजूल सम्पत्तियों के डिस्पोजल के लिए नियम बनाए। जिसके तहत सम्पत्ति को नीलामी के माध्यम से बेचने का निर्णय किया गया। मगर संपत्तियों की नीलामी नहीं हो सकी
—इसके बाद राज्य सरकार द्वारा 3 फरवरी 1977 को जी-शिड्यूल जोड़ते हुए 4 सूत्रीय फार्मूला बनाया। सरकार ने नियम बनाने के लिए एक अपेक्स कमेटी का गठन किया।
—कमेटी ने 6 जनवरी 1982 को निर्णय किया कि वर्तमान कब्जेधारियों को सम्पत्ति की वर्तमान कीमत के अनुसार विक्राय किया जाना उचित होगा लेकिन इस निर्णय की सूचना अधिकांश कब्जेधारियों को नहीं मिली।
—वर्ष 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इस नजूल सम्पत्तियों के वर्तमान कब्जेधारियों के मालिकाना हक के लिए उप मंत्रीमंडलीय समिति का गठन किया लेकिन यह कमेटी भी कुछ नहीं कर पाई।
Published on:
04 Jan 2023 04:35 pm
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