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शहरी सरकार का बजट जन से दूर…खर्चे खूब पर चर्चा नहीं, हर बार कॉपी-पेस्ट करते अफसर

आपकी कॉलोनी का पार्क बदहाल है। घर के बाहर लगी रोड लाइट नहीं जल रही है। सीवर लाइन उफन रही है। सड़कें कचरे से अटी हैं। घर से कचरा उठाने हूपर नहीं आ रहा है। ये सभी काम शहरी सरकार के हैं। यानी लोगों की रोजमर्रा की सर्वाधिक जरूरतें शहरी सरकार पूरा करती है।
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शहरी सरकार का बजट जन से दूर...खर्चे खूब पर चर्चा नहीं, हर बार कॉपी-पेस्ट करते अफसर

शहरी सरकार का बजट जन से दूर...खर्चे खूब पर चर्चा नहीं, हर बार कॉपी-पेस्ट करते अफसर

आपकी कॉलोनी का पार्क बदहाल है। घर के बाहर लगी रोड लाइट नहीं जल रही है। सीवर लाइन उफन रही है। सड़कें कचरे से अटी हैं। घर से कचरा उठाने हूपर नहीं आ रहा है। ये सभी काम शहरी सरकार के हैं। यानी लोगों की रोजमर्रा की सर्वाधिक जरूरतें शहरी सरकार पूरा करती है। लेकिन, जब शहरी सरकार का बजट पेश होता है तो इसकी चर्चा तक नहीं होती। वर्षों से एक ही तरह का बजट पेश किया जा रहा है। सालाना इस बजट को अधिकारी कॉपी और पेस्ट करते आ रहे हैं। फिर बजट बैठक में जनप्रतिनिधि आंखें बंद कर पारित कर देते हैं। जबकि, केंद्र और राज्य सरकार के बजट की चर्चा भी होती है और प्रबुद्धजनों के सुझाव भी लिए जाते हैं। देश के पुणे, तिरुवनंतपुरम, विशाखापट्टनम, बेंगलूरु नगर निगम बजट बनाने के लिए जनता की सलाह लेते हैं।

दो हजार करोड़ से अधिक का बजट
हैरानी की बात यह है कि इस वित्तीय वर्ष में राजधानी के दोनों नगर निगम ने दो हजार करोड़ रुपए से अधिक का बजट पेश किया है। लेकिन, कौन सा पैसा किस मद में खर्च हो रहा है, इसकी जानकारी जनता को नहीं है।

वित्तीय वर्ष 2023-24 का हाल
हैरिटेज निगम:
1082 करोड़ रुपए
ग्रेटर निगम: 1006 करोड़ रुपए

पुणे ने कर दिखाया
वर्ष 2005 में पुणे नगर निगम ने भागीदारी बजट लागू किया। ऐसा करने वाला पुणे देश का पहला नगर निगम बना। हर वर्ष पुणे नगर निगम अगस्त में एक विज्ञापन जारी करता है। एक नागरिक सुझाव फॉर्म ऑनलाइन और वार्ड कार्यालय पर उपलब्ध होता है। इस फॉर्म को शहरवासी भरकर जमा करवाते हैं। नागरिकों के सुझाव प्रभाग समिति को दिए जाते हैं। इसके बाद सुझावों को बोर्ड बैठक में शामिल किया जाता है।

यहां तो ये हो रहा
हैरिटेज निगम:
बोर्ड बने तीन वर्ष हो चुके हैं। बजट के लिए एक बार ही सत्र बुलाया गया। वित्तीय वर्ष 2022-23 और 23-24 में बिना पारित किए ही सीधे राज्य सरकार को भेज दिया।
ग्रेटर निगम: यहां भी स्थिति अलग नहीं है। तीन वर्ष में बजट के लिए एक बार ही सत्र बुलाया गया है। बजट में जो घोषणा की गईं, उनको पूरा करने के लिए पैसे की कमी आड़े आ रही है।

70 फीसदी तक को करता प्रभावित
एक्सपर्ट मानते हैं
कि केंद्र और राज्य सरकार के बजट से ज्यादा शहरी सरकारों का बजट आम आदमी को प्रभावित करता है। केंद्र व राज्य के बजट महज 30 प्रतिशत और नगरीय निकायों व अन्य स्थानीय एजेंसियों का बजट 70 फीसदी तक लोगों को प्रभावित करता है। क्योंकि सीवरेज, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन से लेकर सड़कें, पैदल मार्ग, वर्षा जल की निकासी से लेकर पार्क को विकसित करने का काम निकायों के बजट से तय होता है।


टॉपिक एक्सपर्ट...बजट के मदों में बदलाव करने का समय
शहर का दायरा बढ़ रहा है। लोगों की जरूरतें भी बदल रही हैं। लोग स्वास्थ्य के लिए गंभीर हैं। बच्चे घर के बाहर निकलकर खेलना चाहते हैं। लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ना चाहते हैं। शहर के सार्वजनिक परिवहन का ढांचा भी मजबूत करने के लिए निगम को आगे आना चाहिए। बजट के मदों में बदलाव करने का समय आ गया है। इसकी तैयारी नए सिरे से हो। सही मायने में तो शहरवासियों से ही पूछा जाना चाहिए कि उनको अपनी कॉलोनी में क्या चाहिए? निगम पैसा भी खर्च करता है और लोगों को फायदा भी न मिले तो इसे पैसे की बर्बादी ही कहा जाएगा।
-विष्णु लाटा, पूर्व महापौर, जयपुर नगर निगम