
अब गाय खाएंगी नीम—तुलसी, भैंस चखेगी एलोवेरा और लहसुन
शैलेंद्र शर्मा
जयपुर। अब हमारे देश में गाय, भैंस और बकरी समेत अन्य पालतु पशुओं का इलाज आयुर्वेद पद्धति से किया जाएगा। इसके लिए नेशनल डेयरी डेवलमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) ने योजना बनाई हैं। जिसके तहत पशुओं की बीमारी जैसी समस्या का समाधान हमारी पांरपरिक चिकित्सा पदृति आयुर्वेद पर आधारित एथनो वेटनरी मेडिसीन (ईवीएम) के तहत किया जाएगा। एनडीडीबी का मानना हैं कि वैश्विक स्तर पर मानवों, पशुओं और पर्यावरण के सुरक्षित एवं स्वस्थ्य सह-अस्तित्व की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा हैं। ऐसे में राज्यों में विभिन्न दूध उत्पादक संस्थाओं के माध्यम से ईवीएम को तेजी से बढ़ावा दिया जाएगा।
कोविड—19 ने किया मजबूर
कोविड—19 में जहां पूरा विश्व भारतीय संस्कृति का अनुसरण करने के लिए मजबूर हो गया, वहीं इस महामारी के दौरान हमारी पारंपरिक चिकित्सा पदृति आयुर्वेद को भी खासा महत्व और बढ़ावा मिला हैं। ऐसे में अब पशुओं का इलाज भी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति से किए जाने की योजना पर काम शुरू हुआ। विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (ओआईई) के अनुमानों के अनुसार लगभग 60% मानव संक्रामक रोग जीनोटिक (पशु जन्य) हैं और 75% संक्रमण पशुओं से मानवों में होता हैं। इसके अलावा पशु रोगों के उपचार के लिए एंटी बॉयोटिक के अंधाधुंध उपयोग के चलते एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआऱ) ने एक अदृश्य महामारी का रुप ले लिया हैं। एनडीडीबी का मानना हैं कि आयुर्वेद पर आधारित एथनो वेटनरी मेडिसीन (ईवीएम) से अनेक रोगों जैसे (थनैला, ब्रूसेलोसिस इत्यादि) का उपचार करने पर (एएमआर) की घटनाओं में कमी आएगी।
वेदों का ज्ञान और विषम जलवायु परिवर्तन
एनडीडीबी ने सभी को आयुर्वेद का उपयोग करने के लिए वेदों के ज्ञान और हमारे पूर्वजों की प्राचीन परम्पराओं को पुनर्जीवित करने की सलाह दी। इसकी आशंका बढ़ी है कि विषम जलवायु परिस्थितियों के चलते ग्रामीण परिवारों की आजीविका पर काफी विपरीत प्रभाव पड़ता हैं, क्योंकि इसके कारण दुधारू पशुओं की उत्पादकता एवं दूध उत्पादन प्रभावित हो सकता हैं। इसके लिए सभी की भागीदारी को बढ़ाने की आवश्यकता हैं।
'नेशनल डेयरी डेवलमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) ने हमारे मवेशियों का इलाज आयुर्वेद से कराने का योजना बनाई हैं। इसके लिए पशुओं की बीमारी जैसी समस्या का समाधान आयुर्वेद जैसी वैकल्पिक उपचार पद्धति पर आधारित एथनो वेटनरी मेडिसीन (ईवीएम) को बढ़ावा देने की कार्ययोजना शुरू की जा रही हैं।
दिलीप रथ
अध्यक्ष, नेशनल डेयरी डेवलमेंट बोर्ड
मवेशियों के प्रमुख रोग और उनकी आयुर्वेद विधियां
रोग उपचार सामग्री
थनैला एलोवेरा, हल्दी, नींबू और चूना
स्तनाग्र अवरुद्ध होना नीम का पत्ता, हल्दी, मक्खन और घी
थन में शोफ इडिमा सरसों या तिल का तेल, हल्दी और लहसून
जेर नहीं गिरना मूली, भिंडी, गुड़ और नमक
बांझपन की समस्या मूली, एलोवेरा, हडजोड, करी पत्ता, नमक, सहजन,
गुड़ और हल्दी
शरीर या अंग बाहर एलोवेरा, हल्दी और छुईमुई की पत्तियां
खुरपका—मुंहपका मुहं के छाले जीरा, काली मिर्च, लहसुन, हल्दी, गुड़, मेथीदाना,
नारियल
खुरपका—मुंहपका में पैरों के घाव कुप्पी के पौधे के पत्ते, नीम के पत्ते, लहसून,
नारियल व तिल का तेल, मेहंदी, हल्दी, तुलसी और
सीताफल के पत्ते
बुखार धनिया, लहसुन, तेज पत्ता, काली मिर्च, जीरा,
हल्दी, चिरायता, पान, तुलसी, नीम, बबुई तुलसी के
पत्ते और गुड़।
इसके अलावा दस्त अतिसार, आफरा व अपच, कृमि, चिंचड़ी व बाहृ परजीवी, चेचक, मस्सा, त्वचा का फटना, एलर्जी होना, विष का विकार और जहरीले कीट का डंक व दंश, जोड़ों में सूजन, खांसी, ब्यॉत के बाद खड़ा होने में असमर्थ, कीटनाशक दवा, साइनाइड का जहर, फंफूंद विष का असर, दूध में रक्तस्त्राव, पशु का गर्मी में ताव में नहीं आना जैसे रोगों में एथनो वेटनरी मेडिसिन का उपयोग किया जाएगा।
Updated on:
28 Jul 2020 04:15 pm
Published on:
28 Jul 2020 04:11 pm
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