
जयपुर। सस्टेनेबिलिटी का मतलब केवल पर्यावरण से नहीं है। इस पर विश्व भर में चर्चा हो रही है। प्राथमिक शिक्षा के सिलेबस में 'ईको सिस्टम एंड सस्टेनेबिलिटी' विषय को शामिल करने की जरूरत है। यह बात रविवार को जवाहर कला केंद्र स्थित शिल्पग्राम में पत्रिका बुक फेयर के दूसरे दिन ईको सिस्टम एंड सस्टेनेबिलिटी सत्र में चर्चा के दौरान सामने आई।
सस्टेनेबिलिटी पर करीब तीन दशक से काम कर रहे ठोस कचरा प्रबंधन विशेषज्ञ डॉ. विवेक एस. अग्रवाल ने कहा कि ईको सिस्टम शब्द आते ही हम इसे बाहरी पर्यावरण से जोड़ देते हैं। जबकि, अंदर के ईको सिस्टम को समझना पड़ेगा। कचरा पैदा क्यों हो रहा है? भारत का व्यवहार कचरा पैदा करने का नहीं था।
भोजन की थाली में एक निवाला छोड़ेगे तो क्या प्रभाव पड़ेगा, ये सोचने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हमें पाश्चात्य परंपराओं ने बिगाड़ दिया। पर्यावरण विशेषज्ञ हिमांशु जांगिड़ ने बताया कि प्लास्टिक बोतल वेस्ट का केवल 15 फीसदी ही रिसाइकल हो पा रहा है। उन्होंने कहा कि प्लास्टिक के नुकसान, पानी की उपयोगिता, इलेक्ट्रिसिटी जैसे मुद्दों पर बच्चों की स्कूल स्तर पर समझाना होगा।
जल संग्रहण पर चर्चा के दौरान हिमांशु ने कहा कि भारत में विश्व की 18 फीसदी आबादी रहती है। जबकि, पानी चार फीसदी ही है। आने वाले पांच वर्ष में बड़े शहरों में पानी खत्म होने की आशंका है। अग्रवाल ने कहा कि राजस्थान बावड़ियों के लिए जाना जाता है। जल संग्रहण की ऐसी ही पद्धतियों को जीवित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि राजस्थान में घर के साथ टांका भी होता था। इससे पेयजल आपूर्ति होती थी। बावड़ी, तालाब और कुएं सरकार ने नहीं बनवाए, ये जनसहयोग से बने।
Updated on:
17 Feb 2025 09:12 am
Published on:
17 Feb 2025 08:34 am
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