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ग्रीन बेल्ट में पट्टे जारी करने वाले अफसरों की जांच के आदेश, हाईकोर्ट ने गुलाब कोठारी बनाम राजस्थान सरकार मामले का किया उल्लेख

हाईकोर्ट ने मास्टर प्लान में ग्रीन बेल्ट के रूप में दर्शाई गई भूमि के आवासीय उपयोग पर सख्त रुख दिखाया। साथ ही कहा कि मास्टर प्लान में ग्रीन बेल्ट के रूप में चिह्नित भूमि के आवासीय उपयोग को वैध नहीं ठहराया जा सकता।
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Rajasthan High Court

Rajasthan High Court (Patrika Photo)

जयपुर। हाईकोर्ट ने मास्टर प्लान में ग्रीन बेल्ट के रूप में दर्शाई गई भूमि के आवासीय उपयोग पर सख्त रुख दिखाया। साथ ही कहा कि मास्टर प्लान में ग्रीन बेल्ट के रूप में चिह्नित भूमि के आवासीय उपयोग को वैध नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने ग्रीन बेल्ट की भूमि का आवासीय पट्टा निरस्त करने को उचित माना, वहीं पट्टा जारी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ जांच कर तीन माह में पालना रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट ने ग्रीन बेल्ट के प्रति अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि मास्टर प्लान केवल नीतिगत दस्तावेज नहीं है, बल्कि इसका वैधानिक प्रभाव भी है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने मास्टर प्लान को लेकर पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के मामले में 12 जनवरी 2017 को दिए गए अदालती आदेश का जिक्र करते हुए कहा कि ग्रीन बेल्ट किसी शहर की महत्वपूर्ण इकॉलोजिकल व पर्यावरणीय संपत्ति हैं, जिसका संरक्षण बेहद जरूरी है। ऐसे संरक्षण को कमजोर या विफल करने के प्रशासन के प्रयासों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए। इसका पालन नगरीय निकायों, शहरी विकास प्राधिकरणों सहित सभी स्थानीय निकायों के लिए बाध्यकारी है।

संपत्ति का संवैधानिक अधिकार वैध अधिकारों का रक्षक

कोर्ट ने कहा कि संपत्ति का संवैधानिक अधिकार केवल वैध रूप से अर्जित अधिकारों की रक्षा करता है। यदि कोई अधिकार कानून के उल्लंघन से प्राप्त हुआ है तो उसे संवैधानिक संरक्षण नहीं दिया जा सकता। ऐसे मामले में अधिकारियों की ढिलाई नजरअंदाज करने से शहरी नियोजन कानूनों के संबंध में जनता का विश्वास कम होगा, कानूनी प्रावधानों के दुरुपयोग को बढ़ावा मिलेगा। हरित पट्टी किसी शहर की महत्वपूर्ण इकॉलोजिकल और पर्यावरणीय संपत्ति हैं और उसका संरक्षण केवल एक वैधानिक दायित्व नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 21, 48ए और 51ए(जी) के संदर्भ में यह बाध्यकारी भी है।

याचिकाकर्ता- मैंने पट्टे के आधार पर जमीन खरीदी

याचिका में अलवर नगर निगम के पट्टा निरस्त करने व स्वायत्त शासन विभाग के भू-राजस्व अधिनियम की धारा 90-ए के तहत की गई कार्यवाही को शून्य घोषित करने के आदेश को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसन सभी राजस्व अभिलेखों, धारा 90-ए की कार्यवाही और नगर निगम द्वारा जारी पट्टे के आधार पर भूमि खरीदी, वह बोनाफाइड खरीदार हैं।

सरकार व नगर निगम-ग्रीन एरिया का नियमन संभव नहीं

राज्य सरकार व अलवर नगर निगम की ओर से कहा गया कि भूमि मास्टर प्लान-2031 में ग्रीन बेल्ट/ ग्रीन एरिया दर्ज है,ऐसी भूमि का आवासीय उपयोग या नियमन कानून के विपरीत है। नगर पालिका अधिनियम, 2009 के तहत यदि कोई पट्टा कानून के विरुद्ध या गलत तथ्यों के आधार पर जारी हुआ है तो उसे निरस्त किया जा सकता है।

कोर्ट ने यह भी कहा

  • इस मामले में मास्टर प्लान में हरित क्षेत्र दर्शाई भूमि के भू-उपयोग परिवर्तन, नियमन व आवासीय पट्टे जारी करने की कार्यवाही की गई।
  • यह मामला वैधानिक नगर नियोजन व शहरी विकास कानूनों की नींव पर प्रहार से जुड़ा है।
  • मास्टर प्लान बाध्यकारी वैधानिक दस्तावेज है। नगरपालिका व शहरी विकास से जुड़ा प्रत्येक प्राधिकरण इसके अनुरूप कार्य करने के लिए बाध्य है।
  • पट्टा जारी करने वाले अधिकारियों ने रिकॉर्ड के संरक्षक होने और मास्टर प्लान की पालना के कानूनी दायित्व के बावजूद भू-रूपांतरण और नियमन की मंजूरी दे दी।
  • पट्टा जारी करने वाले अधिकारियों का कृत्य कर्तव्य की भारी अवहेलना या वैधानिक प्रावधानों को जानबूझकर दरकिनार करना प्रतीत होता है। दोनों ही स्थितियां कानूनी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है।
  • प्रमुख स्वायत्त शासन सचिव एवं कार्मिक सचिव भू उपयोग परिवर्तन, नियमन, पट्टा जारी करने की प्रक्रिया के विभिन्न चरणों में शामिल अधिकारियों का पता करें और उनके विरूद्ध विभागीय जांच शुरू कर कानूनी कार्रवाई की जाए।