
कविता-स्त्री
स्त्री
देवश्री गोयल
देह से परे भी...
एक वजूद होता है...
स्त्री का...
भले वह कहती...
नहीं अपने मन की...
पर एक उजला मन...
होता है ...
स्त्री का...
जो सीता नहीं...
बनना चाहती...
न ही द्रौपदी...
होना चाहती...
कोई महाभारत...
कोई रामायण...
रचना नहीं चाहती...
वो तो बस अपने...
पिता के घर...
से पति के घर तक....
एक पगडंडी...
बन कर चलना...
चाहती है...
उसका एक छोटा सा...
आसमान जिसमें...
वो लिख सके...
नई इबारतें प्यार की..
बहुत छोटी चाहतें...
होती हैं स्त्री की...
बहुत सरल...
होती है स्त्री...
कठिन राह पर भी...
सरलता से चलती है...
बस कठिन कर देते हैं...
उसे हालात जब वह...
कठिन बन जाती है...
जब कोई उसकी सरलता को...
उसकी बेवकूफी समझता है...
और चाह कर भी न वो...
महाभारत रचती न रामायण..
वह गढऩे लगती है ता उम्र..
एक नई कहानी ...
एक नई स्त्री की...
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कविता-जो सबको नचाता है
बी.के .शर्मा
उम्र अब प्यार करने लायक सी हो गई।
बात अब इजहार करने लायक सी हो गई।।
आप जब से मेरे हृदय का हिस्सा बन गए।
हर बात दिल की जज्बात लायक सी हो गई।।
बादल बन छा गए तुम दिल पर मेरे।
कि आंखें भी अब बरसात के लायक सी हो गई।।
हम मिलते रहे पल दो पल के लिए।
कि उम्र अब साथ चलने लायक सी हो गई।।
एक फैसला जो साथ रहने का हमने किया।
लगा एक पल में सारी जिंदगी को जी लिया।।
प्यार का इजहार तुमसे कुछ इस तरह किया।
कि खोल जीवन का राज मैंने तुमको दिया।।
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Published on:
11 Dec 2021 08:04 pm
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