
पोलैंड के उप प्रधानमंत्री राडोस्लाव सिकोरस्की: फोटो पत्रिका
जयपुर। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन पर हमले को महज तीन दिन का स्पेशल ऑपरेशन समझा था, लेकिन ये लंबा युद्ध बन गया, इसका खामियाजा आज खुद रूस भी भुगत रहा है। ये कहना है पोलैंड के उप प्रधानमंत्री राडोस्लाव सिकोरस्की का। जेएलएफ के चौथे दिन फ्रंटलॉन में ए कॉन्टिनेंट इन द क्राइसिस: रशिया, यूक्रेन एंड द यूरोपियन स्टोरी विषय पर आयोजित सेशन में सिकोरस्की ने रूस-यूक्रेन युद्ध, यूरोप की सुरक्षा, नाटो की भूमिका और बदलती वैश्विक राजनीति पर विस्तार से अपने विचार रखे।
इस दौरान उन्होंने कहा कि इस संघर्ष में रूस को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है, हर साल अरबों डॉलर युद्ध पर खर्च हो रहे हैं । उनके मुताबिक यह युद्ध केवल जमीन का नहीं, बल्कि यूक्रेन की भू-राजनीतिक दिशा तय करने की कोशिश है। उन्होंने यह भी कहा कि इस संघर्ष ने पूरे यूरोप को झकझोर कर रख दिया है। यूक्रेन को इस युद्ध में भारी नुकसान उठाना पड़ा है। हजारों लोग मारे गए हैं, शहर तबाह हो चुके हैं और लोग माइनस 20 डिग्री की कड़ाके की ठंड में बिजली, हीटिंग और जरूरी बुनियादी सुविधाओं के बिना जीवन गुजारने को मजबूर हैं। उन्होंने यूक्रेन के लोगों से अपील करते हुए कहा कि वे हिम्मत न हारें और अपनी संस्कृति, पहचान और आजादी की रक्षा के लिए मजबूती से डटे रहें।
सेशन में सिकोरस्की ने रूस और यूक्रेन के ऐतिहासिक संबंधों की पृष्ठभूमि भी समझाई। उन्होंने कहा कि भाषा या जातीय समानता राजनीतिक सोच तय नहीं करती। रूस का ऐतिहासिक विकास केंद्रीकृत सत्ता और ऊपर से नीचे चलने वाली व्यवस्था के तहत हुआ, जबकि यूक्रेन लंबे समय तक पोलिश-लिथुआनियन कॉमनवेल्थ का हिस्सा रहा, जहां संसद और अधिकारों की परंपरा विकसित हुई। यही अंतर आज के संघर्ष की जड़ में है। सत्र में सोवियत काल के कृत्रिम अकाल ‘होलोडोमोर’का भी जिक्र हुआ। सिकोरस्की ने कहा कि इस अकाल में लोगों से सब कुछ छीन लिया गया और उन्हें भूख से मरने के लिए छोड़ दिया गया। इसके साथ ही यूक्रेनी संस्कृति और पहचान को नष्ट करने का प्रयास किया गया, जिसकी छाया आज भी रूसी औपनिवेशिक नैरेटिव में दिखाई देती है। रूस और चीन की बढ़ती नजदीकी पर चिंता जताते हुए सिकोरस्की ने कहा कि यह साझेदारी लंबे समय में रूस के राष्ट्रीय हितों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।
नाटो और यूरोप की सुरक्षा पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि अब यूरोपीय देशों को अपनी रक्षा व्यवस्था खुद मजबूत करनी होगी। पोलैंड सहित कई देशों ने अपने रक्षा बजट में बड़ी बढ़ोतरी की है। उन्होंने बताया कि पोलैंड यूक्रेन को लड़ाकू विमान देने वाले शुरुआती देशों में शामिल रहा है और जीडीपी का 3.5 प्रतिशत रक्षा पर खर्च करने की प्रतिबद्धता ले चुका है। यूक्रेनी शरणार्थियों को लेकर सिकोरस्की ने कहा कि लाखों यूक्रेनी नागरिक पोलैंड पहुंचे हैं। इससे अर्थव्यवस्था और समाज पर दबाव पड़ा है, लेकिन मानवीय आधार पर पोलैंड ने हर संभव सहायता दी है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि यूक्रेन ने कभी दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा परमाणु हथियार भंडार छोड़ा था, बदले में उसकी संप्रभुता और सीमाओं की सुरक्षा की गारंटी दी गई थी, लेकिन आज उन्हीं सीमाओं का उल्लंघन हो रहा है। इससे अंतरराष्ट्रीय भरोसे और सुरक्षा वादों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
अमेरिका और यूरोप के रिश्तों पर बोलते हुए सिकोरस्की ने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप के दौर के अनुभवों ने यूरोप को अधिक आत्मनिर्भर बनने की दिशा में सोचने पर मजबूर किया। उन्होंने कहा कि यूक्रेन युद्ध ने यह साफ कर दिया है कि स्थायी शांति का भ्रम टूट चुका है। लोकतंत्र, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और मजबूत प्रतिरोध ही आने वाले समय में यूरोप और दुनिया की स्थिरता की गारंटी बन सकते हैं। यूक्रेन में जारी युद्ध के बीच मानवाधिकार उल्लंघनों का मुद्दा भी सत्र में प्रमुखता से उठा। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई मानवीय कानून मौजूद हैं और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की पिछली बैठकों में इस दिशा में कई अहम निर्णय भी लिए गए हैं। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि यूक्रेन में मानवाधिकार उल्लंघन अब भी जारी है।
सत्र के दौरान रूस और भारत के रिश्तों पर भी चर्चा हुई। सिकोरस्की ने कहा कि भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है और वह किसी एक ध्रुव के साथ खड़ा होने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। रूस के साथ भारत के पुराने और बहुआयामी संबंध रहे हैं, । मौजूदा वैश्विक संकट के बीच भारत ने संतुलन बनाने की कोशिश की है। भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संवाद, कूटनीति और शांति की बात करता रहा है और उसकी भूमिका भविष्य में और अहम हो सकती है क्योंकि वह पश्चिम और रूस—दोनों के साथ संवाद की स्थिति में हैं।
सत्र में उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन और पोलैंड के हालिया इतिहास को भी साझा किया। उन्होंने बताया कि वे कम्युनिस्ट पोलैंड में पले-बढ़े और मार्शल लॉ के दौर में ब्रिटेन में शरणार्थी बने। साम्यवाद के अंतिम चरण को उन्होंने एक सैन्य तानाशाही के रूप में देखा। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में फिलॉसफी, पॉलिटिक्स एंड इकॉनॉमिक्स की पढ़ाई के दौरान उनके सहपाठी बोरिस जॉनसन और डेविड कैमरन जैसे नेता रहे।
स्वतंत्र पोलैंड लौटने के बाद उन्होंने देश के पुनर्निर्माण में भूमिका निभाई। बीते 35 वर्षों को उन्होंने पोलैंड के इतिहास का सबसे सफल दौर बताया, जब देश यूरोप के सबसे गरीब देशों में से निकलकर एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बना और पहली बार जी 20 में आमंत्रित हुआ। उन्होंने अपने शुरुआती पत्रकारिता जीवन का भी जिक्र किया। युवावस्था में वे मुजाहिदीन के साथ अफगानिस्तान गए और वहां से स्टेट्समैन ऑफ कलकत्ता के लिए रिपोर्टिंग की। गुफाओं में बैठकर युद्ध को करीब से देखने का यह अनुभव उनके जीवन और सोच की दिशा तय करने वाला साबित हुआ।
Published on:
18 Jan 2026 03:59 pm
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