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कविता-कुदरत का कहर

Hindi poem

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कविता-कुदरत का कहर

कविता-कुदरत का कहर

पाखी जैन

कुदरत का कहर कैसा है?
कुदरत का कहर कैसा है?
कुदरत का कहर भयानक है
कुदरत का कहर भयानक है

कभी खूब सारे तूफान आए
तो कभी खूब सारी बीमारियां आईं
अभी दुनिया में है कोरोना
कुदरत का प्रकोप है कोरोना

ऐसी और बीमारियां आएंगी
कुदरत हम सबको डराएगी
हां कुदरत हम सबको डराएगी

ऐसे तूफान खूब आते रहेंगे
हमारी गलती बताते रहेंगे
हमको सुधरना होगा
हां हमको सुधरना होगा
कुदरत को हंसाना होगा

कुदरत की पुकार है
मत करो पाप
जीवों को मारकर तो मत करो पाप
मनुष्यों कुदरत तड़प रही है
इसलिए सबकुछ हड़प रही है

पाप करोगे तो इसी तरह
धरती सताएगी
बची खुची खुशियां भी चली जाएंगी
और ज्यादा तूफान आएंगे
फिर रोग और बढ़ जाएंगे
हम लोग तड़प जाएंगे
हम लोग हड़प जाएंगे
कुदरत भस्म हो जाएगी
खुशियां भस्म हो जाएगी

कुदरत का कहर कैसा है?
कुदरत का कहर भयानक है
कुदरत का कहर भयानक है