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कविता- उठते इन सवालों का घरौंदा तुम बनने ना दो..

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कविता- उठते इन सवालों का घरौंदा तुम बनने ना दो..

कविता- उठते इन सवालों का घरौंदा तुम बनने ना दो..

शिखा सिंघवी

सवाल मन में उठ रहे थे जाने कैसे कैसे?
दिन ये कैसे आए हैं? बीतेंगे ये कैसे?
क्यूं कुछ अपनों का साथ छूटा, चाहे कुछ पराए बन गए अपने,
दामन में ख़ुशियां भी आईं थी,मगर..
क्यूं कुछ टूटे थे सपने?

वक्त का पहिया क्यूं चलता जा रहा है?
अखियों का पानी क्यूं बहता जा रहा है?
आईने में चेहरा अपना छुपने ना दो,
अपनी ख्वाहिशों को मन में दबने ना दो,
अरमानों को दिल में ही खोने ना दो,
उठते इन सवालों का घरौंदा तुम बनने ना दो..!

सागर कहां भरता है कुछ बूंदों से...
तूफां को शोर मचाने दो,
जिंदादिली है बचपने में,
इन नादानियों को खोने ना दो,
मंजिल की परवाह क्यूं करते हो,
कदमों को अपने थमने ना दो,
राहों में कांटे आएंगे,पत्थर भी बिछ जाएंगे,
इन बेमतलब के कहरों से जहन को अपने भरने ना दो,
उठते इन सवालों का घरौंदा तुम बनने ना दो..!

जो गुजर गया कल,
आज याद कर लेना मगर,
आने वाले कल में उसे साया अपना बनने ना दो,
कैसे होगी शाम और सुबह?
कैसे पल ये गुजरेंगे?
चंचल बहती हवा का रुख जाने कैसे बदलेंगे?
हजारों परतें आंखों में बनने लगी हैं,
ख्वाब ये हकीकत में बदलेंगे कैसे?
पर्वत जो ये नभ को छूने लगा तो क्या,
नजरों को तुम झाुकने ना दो,
उठते इन सवालों का घरौंदा तुम बनने ना दो..!

रीतने लगेंगे गम भी ये सारे,
पतझड़ से क्या फिर डरना?
बहारें फिर से आएंगी,
पीले पत्तों से बगिया भरने ना दो..
मजबूत रखो इरादा अपना,
हौसले को झाुकने ना दो..,
उठते इन सवालों का घरौंदा तुम बनने ना दो..!