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कविता-बेटी

बेटी

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कविता-बेटी

कविता-बेटी

प्रिया राजावत

एक बेटी हूं
दिल की बात कहती हूं,
'बेटी बोझ नहीं है',
यह झाूठ नहीं कहूंगी ।
'बेटी बोझ-सी ही है',
मैं यह सच स्वीकार करती हूं।

क्योंकि देखा है मैंने,
मां-बाप को चिंता में डूबे हुए,
एक बेटी की वजह से ।
उसके ख्वाबों को पूरा करने की खातिर,
उसे कामयाबी के पंख देने की खातिर,
उसे दुनियां के अंधेरे से बचाने की खातिर,
उसे हर खुशी देने की खातिर,
फिर अपनी लाड़ली के लिए
एक अच्छा हमसफर ढूंढने की खातिर,
और फिर देखा है मैंने उन्हें,
दहेज के भूखों का मुंह भरने की खातिर,
अपनी नींदें, अपना सुख-चैन
ताक पर रखते हुए ।

एक बेटी हूं,
दिल की बात कहती हूं,
खुदा करे हर मां-बाप की बेटी का नसीब बेहतरीन हो ।


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