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Progressive Writers Association Jaipur: हिंदी की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘लहर’ और उसके संस्थापक-संपादक प्रकाश जैन के साहित्यिक अवदान को याद करते हुए प्रगतिशील लेखक संघ, जयपुर की ओर से शनिवार को राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति के सभागार में 'लहर और प्रकाश जैन : एक स्वर्णिम अध्याय' विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि ‘लहर’ ने हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता को नई दिशा दी और अनेक महत्वपूर्ण रचनाकारों को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
मुख्य वक्ता वरिष्ठ आलोचक राजाराम भादू ने कहा कि ‘लहर’ अब हिंदी साहित्य के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय बन चुकी है। उन्होंने कहा कि साहित्यिक पत्रिकाएँ समाज के ‘पब्लिक स्फियर’ का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं और ‘लहर’ ने कविता, नई कहानी, अकविता, गीत तथा विभिन्न साहित्यिक धाराओं के बीच संवाद स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने कहा कि पत्रिका की सबसे बड़ी विशेषता उसका वैचारिक खुलापन था, जहाँ किसी एक विचारधारा का वर्चस्व नहीं था।
मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक ओम थानवी ने कहा कि ‘लहर’ ने साहित्यिक मतभेदों को कम करने और संवाद की संस्कृति विकसित करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि उस समय ‘वातायन’, ‘बिंदु’ और ‘लहर’ राजस्थान की प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाएँ थीं, जिनमें ‘लहर’ का स्थान सबसे महत्वपूर्ण था। उन्होंने कहा कि उस दौर में ‘लहर’ में प्रकाशित होना किसी भी लेखक के लिए प्रतिष्ठा का विषय माना जाता था। उन्होंने प्रकाश जैन को उदार दृष्टि वाला संपादक बताते हुए कहा कि उनकी रचनात्मक समझ और प्रतिभा पहचानने की क्षमता आज भी स्मरणीय है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. मोहन श्रोत्रिय ने कहा कि 1970 के दशक में अजमेर, प्रकाश जैन और ‘लहर’ एक-दूसरे के पर्याय बन चुके थे। उन्होंने कहा कि प्रकाश जैन ने साहित्यिक पत्रकारिता को मिशन की तरह लिया और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद पत्रिका की गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं किया। वे स्वयं कम बोलते थे, लेकिन दूसरों को गंभीरता से सुनते थे और नई प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
आयोजन समिति के सदस्य अनंत भटनागर ने बताया कि ‘लहर’ का पहला अंक जुलाई 1957 में अजमेर से प्रकाशित हुआ था। उन्होंने कहा कि यह एक लेखक द्वारा लेखकों के लिए निकाली गई पत्रिका थी। प्रकाश जैन की औपचारिक शिक्षा केवल आठवीं तक थी, लेकिन उन्होंने अपनी संपादकीय दृष्टि और साहित्यिक प्रतिबद्धता के बल पर ‘लहर’ को राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका बना दिया। उन्होंने बताया कि उदय प्रकाश, ममता कालिया, अशोक वाजपेयी और हेमंत शेष सहित अनेक साहित्यकारों की प्रारंभिक रचनाएँ ‘लहर’ में प्रकाशित हुईं। उन्होंने यह भी कहा कि स्वयं प्रकाश जैन ने अपनी कविताएँ कभी ‘लहर’ में प्रकाशित नहीं कीं और संपादकीय निष्पक्षता का दुर्लभ उदाहरण प्रस्तुत किया।
वक्ता डॉ. सुभाष धायल ने अपने शोधपरक वक्तव्य में कहा कि ‘लहर’ का प्रकाशन हिंदी की लघु पत्रिका परंपरा की एक बड़ी साहित्यिक घटना थी। उन्होंने कहा कि पत्रिका ने नई कविता, नई कहानी और आधुनिक साहित्यिक आंदोलनों को गंभीर मंच प्रदान किया तथा हिंदी साहित्य में वैचारिक बहुलता और रचनात्मक स्वतंत्रता को सशक्त किया।
इस अवसर पर प्रकाश जैन के पुत्र सुधीर जैन ने ‘लहर’ के सभी अंकों के डिजिटाइजेशन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि प्रकाश जैन के जीवन और साहित्यिक अवदान पर समग्र शोध होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ‘लहर’ उनके पिता का जुनून थी और उसके प्रकाशन के लिए उन्होंने अपना धन-संपत्ति तक समर्पित कर दी। उन्होंने बताया कि प्रकाश जैन अत्यंत संवेदनशील, आत्मीय और सादगीपूर्ण व्यक्तित्व के धनी थे तथा मंचों पर औपचारिक सम्मान स्वीकार करने से भी बचते थे। संगीत जैन ने भी आयोजन के लिए आभार व्यक्त करते हुए परिवार की ओर से ‘लहर’ की विरासत के संरक्षण का संकल्प व्यक्त किया।
कार्यक्रम में साहित्यकारों, पत्रकारों, शोधार्थियों तथा बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमियों ने भाग लिया। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि ‘लहर’ हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता की अमूल्य धरोहर है और उसके संरक्षण, डिजिटाइजेशन तथा प्रकाश जैन के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर गंभीर शोध की आवश्यकता है।
Updated on:
20 Jul 2026 08:15 am
Published on:
20 Jul 2026 08:14 am
