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Guru Pushya Nakshatra गुरु पुष्य योग में इन सरल उपायों से होती है भाग्य वृद्धि, यह दशा आते ही जरूर मिलेंगे फल

जो लोग यह मानते हैं कि उन्हें भाग्य का साथ नहीं मिलता, उनके भाग्य वृद्धि के लिए गुरु पुष्य योग बहुत अच्छा मुहूर्त है। प्रायः गुरू पुष्य नक्षत्र में कीमती वस्तुओं, ज्वैलरी आदि की खरीदी की बात कही जाती है पर यह अवधि साधना या पूजा पाठ के लिए भी बहुत फलदायी होती है। कर्मफलदाता शनि और भाग्य के कारक गुरू यानि बृहस्पति के इस संयोग के दौरान की गई पूजा-अर्चना का फल निश्चित रूप से मिलता ही है। इतना ही नहीं गुरु पुष्य योग में की गई साधना स्थाई फल प्रदान करती है।

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Gupt Navratri will be from Guru Pushya, Selfishness, Amrit Siddhi and

Gupt Navratri will be from Guru Pushya, Selfishness, Amrit Siddhi and

जयपुर. जो लोग यह मानते हैं कि उन्हें भाग्य का साथ नहीं मिलता, उनके भाग्य वृद्धि के लिए गुरु पुष्य योग बहुत अच्छा मुहूर्त है। प्रायः गुरू पुष्य नक्षत्र में कीमती वस्तुओं, ज्वैलरी आदि की खरीदी की बात कही जाती है पर यह अवधि साधना या पूजा पाठ के लिए भी बहुत फलदायी होती है। कर्मफलदाता शनि और भाग्य के कारक गुरू यानि बृहस्पति के इस संयोग के दौरान की गई पूजा-अर्चना का फल निश्चित रूप से मिलता ही है। इतना ही नहीं गुरु पुष्य योग में की गई साधना स्थाई फल प्रदान करती है।

ज्योतिषाचार्य पंडित सोमेश परसाई बताते हैं कि ज्योतिष में कुंडली में नवग्रहों की स्थिति के अनुसार अच्छे या बुरे फल मिलने की बात कही जाती है। कुंडली में ग्रहों की कारक या अकारक और कमजोर या मजबूत स्थिति को ध्यान में रखते हुए उनके फल बताए जाते हैं। यह भी सर्वविदित है कि ग्रह अपना अच्छा या बुरा फल उनकी दशा में देते हैं अर्थात महादशा, अंतरदशा या प्रत्यंतरदशा में परिणाम प्राप्त होते हैं। इनमें गुरू शनि दशा सबसे ज्यादा अहम होती है। यह जीवन की निर्णायक दशा रहती है जिसमें हमें अपने अच्छे-बुरे कर्मां के अनुसार ही परिणाम मिलते हैं।

ज्योतिष ग्रंथों में गुरू यानि बृहस्पति और शनि की दशा अंतरदशा प्रत्यंतरदशा में कर्मफल मिलने की बात कही गई है। जब भी इन दोनों ग्रहों की दशा अंतरदशा प्रत्यंतरदशा आती है हमें अपने अच्छे कर्मां के अच्छे परिणाम और बुरे या गलत कामों के बुरे परिणाम मिलते ही हैं। इस अवधि का पूरा लाभ उठाने के लिए जहां हमें अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से पालन करना चाहिए वहीं खासतौर पर देवगुरू बृहस्पति की भी आराधना करनी चाहिए। इसके लिए गुरु पुष्य योग सबसे स्वर्णिम अवसर है।

ज्योतिषाचार्य पंडित नरेंद्र नागर के अनुसार गुरु पुष्य योग में देवगुरू बृहस्पति के बीज मंत्र ओम ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरूवै नमः का जाप करना चाहिए। विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ भी फलदायी होता है। इस योग में शनि के बीज मंत्र ओम प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराए नमः का जाप भी करना चाहिए। इसके साथ ही दशरथकृत शनि स्तोत्र या ऋषि पिप्पलाद कृत शनि स्तोत्र का पाठ भी करना चाहिए। गुरु पुष्य योग में पीला पखराज धारण करना भी अत्यन्त शुभ फलदायी माना गया है।

31 दिसम्बर को गुरूवार को पुष्य नक्षत्र है अर्थात इस दिन गुरू पुष्य योग बन रहा है। गुरूवार के दिन शनि के नक्षत्र पुष्य नक्षत्र को बहुत शुभ माना जाता है। 31 दिसंबर 2020 को रात 7.26 बजे से गुरु पुष्य योग बन रहा है। दूसरे दिन यानि नववर्ष 2021 की पहली तारीख एक जनवरी की रात 8.02 बजे तक यह योग बना रहेगा। ज्योतिषाचार्य पंडित जीके मिश्र के अनुसार 31 दिसंबर से 1 जनवरी तक के 24 घंटे 46 मिनट की इस अवधि में गुरू और शनिदेव की साधना आपका भाग्य बदल देगी, यह तय है।