
- सुनील सिंह सिसोदिया
जयपुर। राज्य की सियासत (Rajasthan Assembly Election 2018) में आज भले ही प्रतिद्वंद्विता बढ़ रही है लेकिन आजादी के बाद ऐसा समय भी था जब मैदान खाली था। जरूरत थी बस जुझारूपन की। इस गुण के साथ राजनीति के खाली मैदान में जो भी उतरा, परिवार के लिए मजबूत सियासी की ‘विरासत‘ खड़ी कर गया। इनमें दर्जनभर परिवार ऐसे हैं जो पीढिय़ों से पारी खेल रहे हैं। इन पीढिय़ों में से कोई सांसद-विधायक या मंत्री रहा तो किसी ने संगठनों में अहम जिम्मा संभाला।
आजादी के बाद उभरे नेताओं में कई तो साधारण परिवारों से थे। राजतन्त्र से लोकतन्त्र में आई जनता तब इतनी जागरूक नहीं थी कि टिकट के लिए मारामारी मचे। ऐसे में जो भी नेता उभरा, उसे कुछ कर दिखाने का भरपूर मौका मिला। राजा-महाराजाओं और अंग्रेजों के राज से मुक्त हुई जनता को मिलने और अपनी बात सीधे कहने का अवसर मिला तो उसने नेताओं को अपना मसीहा मान लिया। कई नेता साधारण परिवारों से होने के कारण जनता का दुख-दर्द समझते थे। लोगों से सहज भाव से मिलते-जुलते, व्यक्तिगत कार्यों में दखल नहीं देते। जाति-धर्म की राजनीति से दूर सभी वर्गों के मतदाताओं से जुड़े रहते। कार्यकर्ताओं को भी सम्मान देते, उनके काम कराते। ऐसे में निष्ठावान कार्यकर्ताओं की बड़ी टीम उनके लिए खड़ी रहती। उस दौर के करीबी गवाह रहे दिग्गज नेताओं की मानें तो एक पहलू यह भी था कि लोगों में राजनीति के प्रति जागरुकता नहीं थी। बड़े नेताओं के सामने कोई टिकट मांगने से डरता था। इसलिए जो राजनीति में उतरकर आगे बढ़ा प्राय: वही बढ़ता गया। वयोवृद्ध नेताओं का कहना है कि यह वह दौर था जब सरकार किसी भी दल की हो, नेताओं-कार्यकर्ताओं के व्यक्तिगत सम्बन्ध सभी से अच्छे रहते थे। सभी दलों के कार्यकर्ताओं के काम होते थे। नौकरशाही पर भी दबदबा रहता था।
बढ़ी टिकट की चाह, मुश्किल होती गई राह
आजादी के बाद ज्यों-ज्यों समय बीता और राजनीति के प्रति लोगों में जागरुकता बढ़ी, टिकट की होड़ भी बढ़ती गई। बड़े नेताओं को भी चुनौतियां मिलने लगीं। ऐसे में जिन नेताओं और उनकी पीढ़ी के युवाओं ने लोगों से मधुर व्यवहार रखा, वे तो आगे बढ़ते रहे लेकिन जिन नेताओं की पीढिय़ां जनता से दूर हुईं वे अपनी सियासी विरासत से भी दूर हो गईं।
भैरोसिंह शेखावत
मुख्यमंत्री, उपराष्ट्रपति बने। दामाद नरपत सिंह राजवी मंत्री रहे,
अभी विधायक हैं। भतीजे प्रतापसिंह खाचरियावास विधायक रहे। भान्जे सत्येन्द्र सिंह राघव प्रवक्ता हैं।
विजयाराजे सिंधिया
खुद सांसद रहीं। पुत्री वसुंधरा मुख्यमंत्री, यशोधरा राजे मंत्री हैं। पुत्र माधवराव सिंधिया और पौत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया मंत्री रहे, नाती दुष्यंत सिंह सांसद हैं।
रामनिवास मिर्धा
खुद केन्द्रीय मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष रहे। पुत्र हरेन्द्र मिर्धा मंत्री रहे।
परसराम मदेरणा
स्वयं मंत्री रहे। पुत्र महिपाल मदेरणा मंत्री रहे। पत्नी लीला मदेरणा ने विधानसभा चुनाव लड़ा, पोती दिव्या मदेरणा राजनीति में सक्रिय हैं।
नाथूराम मिर्धा
पुत्र भानु प्रकाश मिर्धा सांसद, भतीजा राज्य में मंत्री रिछपाल मिर्धा, व पौत्री ज्योति मिर्धा सांसद रहीं।
राजेश पायलट
स्वयं मंत्री रहे। पत्री रमा पायलट सांसद रहीं, पुत्र सचिन पायलट मंत्री रहे और अभी कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष हैं।
शीशराम ओला
स्वयं मंत्री रहे। पुत्र विजेन्द्र ओला विधायक हैं।
महेन्द्रा कुमारी
स्वयं सांसद रहीं। पुत्र जितेन्द्र सिंह केन्द्रीय मंत्री रहे।
भीखाभाई भील
स्वयं मंत्री रहे। पुत्र सुरेन्द्र बामणिया विधायक रहे। पुत्री कमला भी विधायक रहीं।
गुलाबसिंह शक्तावत
स्वयं गृहमन्त्री रहे। पुत्र गजेन्द्र सिंह ससंदीय सचिव रहे।
रिखबचंद धारीवाल
स्वयं और पुत्र शांति धारीवाल मंत्री रहे।
कुम्भाराम आर्य
स्वयं सांसद व विधायक रहे। पुत्रवधू सुचित्रा आर्य विधायक रहीं।
जुझार सिंह
स्वयं सांसद और पुत्र भरतसिंह मंत्री रहे।
Published on:
19 Oct 2018 09:45 am

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