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राजस्थान में खौफ का साया! सांडों की लड़ाई, सड़कों पर मौत की परछाई, टूटी कई जिंदगियों की डोर, लोगों के लिए बन रहे ‘काल’

सड़कों पर सांडों की लड़ाई अब सिर्फ एक दृश्य नहीं, एक चेतावनी बन चुकी है। जहां एक ओर ये मूक पशु अपनी ताकत और वर्चस्व के लिए भिड़ते हैं, वहीं दूसरी ओर आमजन की जिंदगी, यातायात और सुरक्षा दांव पर लग जाती है। दहशत, जाम और दुर्घटनाओं के रूप में आमजन को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।
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जयपुर

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Arvind Rao

Sep 26, 2025

Bull Fights

सांडों की लड़ाई, सड़कों पर मौत की परछाई

जयपुर: राजस्थान के कई जिलों में बेसहारा सांडों की समस्या विकराल रूप ले चुकी है। जयपुर, कोटा, बालोतरा, जैसलमेर, बाड़मेर, सीकर और झुंझुनूं जैसे शहरों में सांडों के हमलों और सड़क हादसों में काफी लोगों की जान जा चुकी है और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए हैं।


यह समस्या अब गंभीर सार्वजनिक सुरक्षा संकट बन चुकी है। जब सांडों में लड़ाई होती है तो सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता है। राज्य में हर दिन कहीं न कहीं नया हादसा सांडों के कारण हो रहा है। सांडों की लड़ाई की चपेट में विदेशी पर्यटक भी आ चुके हैं। सांडों की ट€क्कर खासतौर से बाइक सवारों के लिए काल है।


हादसों के आंकड़े सरकारी विभागों ने संधारित नहीं किए हैं। पत्रिका टीम ने अलग-अलग शहरों में पड़ताल की तो सांडों की लड़ाई में अपनों को खो चुके परिजन का दर्द फूट पड़ा।


जयपुर : उपचार में ढाई लाख खर्च हुए


चित्रकूट से€क्टर एक निवासी प्रदीप माथुर एक जुलाई को घर के बाहर टहल रहे थे। इस दौरान सांड ने पीछे से हमला कर दिया। उनको गंभीर चोट आई। घर में कोई सदस्य नहीं है। ऐसे में पड़ोसी और अन्य ने अस्पताल में भर्ती करवाया। निजी अस्पताल में करीब 15 दिन तक इलाज चला। उनका करीब ढाई लाख रुपए खर्च हो गया। हादसे के बाद आज भी उस स्थान पर सांड घूम रहे हैं। इस कारण लोग उस रास्ते में बच्चों को अकेल नहीं भेजते।


बालोतरा : बाइक पर जाते समय हमला


बालोतरा के दिनेश बारूपाल ने बताया कि 28 मई 2024 को उनके भाई मुकेश बारूपाल समदड़ी रोड स्थित अपने घर बाइक से जा रहे थे। रोड के किनारे आपस में लड़ रहे दो सांड में से एक ने सामने आकर मुकेश पर हमला किया, जिससे मुकेश गंभीर घायल हो गया। लोगों ने मुकेश को अस्पताल भेजा। हालत गंभीर होने के कारण वहां से उन्हें जोधपुर रेफर किया। जहां चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया।


ऐसे खुल सकती है समाधान की राह


ब्लॉक स्तर पर- नंदीशाला का निर्माण किया जाए, पंचायतों को संचालन की जिम्मेदारी दी जाए। नंदीशालाओं में चारा, पानी और चिकित्सा सुविधा सुनिश्चित की जाए। कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत निजी कंपनियों से सहयोग लिया जा सकता है।


सांडों की पहचान- पकड़ और पुनर्वास की व्यवस्था, पुनर्वास के अभाव में पकड़ गए सांडों को फिर से छोड़ दिया जाता है। नगर निगम या पंचायत स्तर पर पशु पकड़ने वाली टीम गठित की जाए। एक डिजिटल डेटा बेस बनाया जाए, जिसमें सांडों की जानकारी दर्ज हो। टैगिंग या कान पर नंबरिंग से पहचान दी जाए।


धार्मिक स्थलों, स्कूलों-बाजारों के पास विशेष निगरानी- सीसीटीवी कैमरे और गश्ती दल तैनात किए जाएं। स्थानीय स्वयंसेवी संगठनों को निगरानी में शामिल किया जाए। इन क्षेत्रों में सांडों को आकर्षित करने वाले कचरे या भोजन को हटाया जाए।


सांडों को खुला छोड़ने पर दंडात्मक कार्रवाई- पशुपालकों की पहचान कर उन्हें नोटिस जारी किया जाए। जुर्माना या कानूनी कार्रवाई का प्रावधान किया जाए। पशुपालकों को सांडों के पुनर्वास के लिए प्रोत्साहन दिया जाए। अभियान चलाकर पशुपालकों को जिम्मेदार बनाया जाए।


राह चलते हुए हादसे, कई ने गंवाई जान


बालोतरा जिले में 3 वर्ष में 30 से अधिक घटनाएं हुई। पांच लोगों की मौत और 20 लोग घायल हुए।
जैसलमेर जिले में 5 वर्ष में 34 हादसे हुए, 19 लोग गंभीर घायल हुए।
बाड़मेर जिले में 3 वर्ष में 7 हादसे हुए, 5 लोग गंभीर घायल हुए।
सीकर जिले में 7 वर्ष में सांडों के हमले से चार लोगों की मौत और 20 से अधिक लोग घायल हुए।
कोटा जिले में गत मई महीने में 2 मौतें हुई।
झुंझुनूं जिले में पिछले दिनों 3 मौतें हो चुकी हैं।
जयपुर जिले में पिछले कुछ दिनों में ही 6 मौतें हो गई।
भरतपुर जिले में 3 साल में 7 लोगों की मौत हुई।