
AI जनरेटेड प्रतीकात्मक तस्वीर
समान नागरिक संहिता (UCC) से विवाह और तलाक के मामलों में अनुसूचित जनजाति को छोड़कर सभी धर्म और जाति की महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार मिल सकेंगे, जिसमें वसीयत, विरासत और पैतृक संपत्ति से जुड़े अधिकार शामिल हैं। इससे बेटी विवाहित हो या अविवाहित, मायके में बेटों के समान उत्तराधिकार की हकदार होगी। इसके विपरीत विधि के जानकार पुत्रवधू को संपत्ति में मायके व ससुराल दोनों जगह मिलने वाले अधिकार और अलग-अलग धर्म के युवक-युवतियों के लिव इन रिलेशनशिप संबंधी मामलों को लेकर स्पष्टता का अभाव बता रहे हैं।
विधेयक के अनुसार लिव-इन रिलेशनशिप के दौरान जन्मे बच्चों को वैध संतान (धर्मज) माना जाएगा, जिससे उन्हें माता-पिता की संपत्ति और भरण-पोषण का पूर्ण अधिकार मिलेगा। विधि के जानकारों के अनुसार स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन कर दूसरे धर्म के जीवनसाथी से शादी करना आसान होगा लेकिन अलग-अलग धर्म के युवक-युवतियों के स्वेच्छा से लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने के मामलों में स्पष्टता का अभाव है।
यूसीसी में 404 धाराएं व विभिन्न प्रावधानों के संबंध में 7 अनुसूचियां हैं। इस विधेयक को हाल ही संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल ने विधानसभा पेश किया था।
विवाह संपन्न होने के 60 दिन के भीतर पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। इसकी पालना न होने पर 10,000 रुपए तक जुर्माना होगा। इसी तरह लिव इन रिलेशनशिप में रहने वालों को भी शुरुआत और समाप्ति के बारे में लिखित सूचना देकर पंजीकरण कराना अनिवार्य किया गया है।
विवाहित बेटी को मायके में और उसे पुत्रवधू के रूप में ससुराल में भी समान अधिकार मिल सकेंगे। ऐसे में उसके दोनों पक्षों के प्रति दायित्व भी होंगे। ऐसे में पुत्रवधू के रूप में महिला कार्मिक के मामले में राजस्थान सरकार स्वास्थ्य योजना (RGHS) में मां-बाप व सास-ससुर दोनों को स्वास्थ्य कवरेज का लाभ देना चाहिए। सरकार ने पिछले दिनों दोनों पक्षों में से एक का चयन करने का विकल्प लिया था, जिसे वापस लिया जाए।
गजेन्द्र सिंह राठौड़, प्रदेशाध्यक्ष, अखिल राजस्थान राज्य कर्मचारी संयुक्त महासंघ (एकीकृत)
Updated on:
24 Aug 2026 07:15 am
Published on:
24 Aug 2026 07:15 am
