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‘एक बीज-एक ही मां’ आलेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएं

Reaction On Gulab Kothari Article : पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के विशेष लेख- ‘एक बीज-एक ही मां’... पर प्रतिक्रियाएं
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जयपुर

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Rakesh Mishra

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Updated: 20 Jun 2026, 6:27 PM IST

Gulab Kothari Article

पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी। फोटो- पत्रिका

जयपुर। पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के आलेख ‘एक बीज-एक ही मां’ को पाठकों ने भारतीय ज्ञान परंपरा, प्रकृति-दर्शन और मातृशक्ति की गहन व्याख्या के रूप में सराहा है। पाठकों का मानना है कि यह लेख सृष्टि, प्रकृति और मातृत्व के बीच विद्यमान गहरे एवं अविभाज्य संबंधों को दार्शनिक तथा वैज्ञानिक दृष्टि से समझाने का प्रयास करता है। लेख में प्रकृति को समस्त जीवन की जननी तथा सृजन, पोषण और संरक्षण की मूल शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। विशेष रूप से सह-अस्तित्व, पर्यावरण संरक्षण, मातृत्व की सार्वभौमिक अवधारणा और समस्त जीव-जगत की एकात्मकता पर किए गए चिंतन ने पाठकों को गहराई से प्रभावित किया है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से—

"एक बीज-एक ही मां" लेख पढ़कर मुझे भारतीय ज्ञान परंपरा की गहनता और प्रकृति के प्रति आदरभाव का अनुभव हुआ। लेख में सृष्टि के विस्तार में मातृशक्ति की भूमिका को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इससे यह संदेश मिलता है कि सृजन, पोषण और संरक्षण के मूल में प्रकृति तथा मातृत्व की शक्ति निहित है। लेख मानव और प्रकृति के बीच गहरे संबंध को समझने की प्रेरणा देता है। यह विचार कि समस्त जीव-जगत एक ही सृजन-तत्व से जुड़ा है, हमें सह-अस्तित्व, संवेदनशीलता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी-2020) भी भारतीय ज्ञान परंपरा, पर्यावरणीय चेतना, नैतिक मूल्यों तथा समग्र विकास पर बल देती है। इस दृष्टि से यह लेख विद्यार्थियों में प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व, जीवन-मूल्यों और वैज्ञानिक-आध्यात्मिक चिंतन का विकास करने में सहायक सिद्ध होता है। अत: यह लेख केवल सृष्टि की व्याख्या नहीं करता, बल्कि जीवन में संतुलन, संवेदना और प्रकृति के सम्मान का महत्वपूर्ण संदेश भी प्रदान करता है।

  • राशि सिंह सोलंकी, शिक्षिका, इंदौर

यह लेख सृष्टि और प्रकृति के गहरे संबंधों को दर्शाता है, जो अत्यंत सारगर्भित है। प्रकृति हमारे जीवन का आधार है और हमें उसका सम्मान करना चाहिए। मनुष्य, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे सभी एक ही सृष्टि के अंग हैं। यह लेख हमें पर्यावरण संरक्षण, समानता और प्रेम का संदेश देता है। आज के समय में, जब प्रकृति को लगातार नुकसान पहुंचाया जा रहा है, ऐसे विचार हमें अपनी जिम्मेदारियों का बोध कराते हैं। वास्तव में यह लेख जीवन की एकता और प्रकृति के महत्व को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है।

  • सुनील दिघेकर, भोपाल

गुलाब कोठारीजी ने "एक बीज-एक ही मां" लेख के माध्यम से मनुष्य जीवन और प्रकृति के संबंधों को प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया है। जैसे एक बीज से पूरा वृक्ष विकसित होता है, वैसे ही एक ही मूल शक्ति से संपूर्ण सृष्टि का निर्माण हुआ है। इस प्रकार के विचार हमें सभी जीवों के प्रति सम्मान और करुणा का भाव रखने की सीख देते हैं। लेख में गहराई के साथ समझाया गया है कि मानव जीवन प्रकृति के बिना अधूरा है। हमें जल, वायु, पेड़-पौधों तथा सभी जीवों का संरक्षण करना चाहिए। प्रकृति को माँ मानकर उसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। इस प्रकार के लेख आध्यात्मिक चिंतन के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी उत्पन्न करते हैं।

  • महेंद्र शर्मा, भोपाल

सृष्टि के विस्तार और जीवन के संचालन में "मां", अर्थात् सृजन-शक्ति की केंद्रीय भूमिका है। सृजन केवल जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सार्वभौमिक व्यवस्था है। प्रत्येक जीव, प्रकृति और ब्रह्मांड एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यह लेख मातृत्व, सृजन और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव जगाता है तथा जीवन के गहरे आध्यात्मिक रहस्यों पर चिंतन करने के लिए प्रेरित करता है। आलेख अत्यंत पठनीय है।

  • अजय शुक्ला, बैतूल

यह आलेख प्रकृति और मातृत्व के गहरे संबंध को दर्शाता है। इसमें बताया गया है कि प्रकृति सभी जीवों की जननी है और प्रत्येक जीव उसी से पोषित होता है। जिस प्रकार बीज से पौधा जन्म लेता है, उसी प्रकार जीवन का आधार भी प्रकृति ही है। लेख में पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संतुलन और मानवीय जिम्मेदारी पर विशेष जोर दिया गया है। यह संदेश देता है कि यदि हम प्रकृति का सम्मान नहीं करेंगे, तो जीवन स्वयं संकट में पड़ जाएगा। अंतत: यह लेख मनुष्य को प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर जीने और उसकी रक्षा करने की प्रेरणा देता है।

  • पं. नरेंद्रनाथ पांडेय, ग्वालियर

आलेख "एक बीज-एक ही मां" सृष्टि, प्रकृति और मातृत्व के संबंधों को भारतीय दार्शनिक दृष्टि से समझाने का एक गंभीर प्रयास है। लेखक ने वेद, गीता और प्रकृति के सिद्धांतों के आधार पर यह प्रतिपादित किया है कि सृष्टि के विस्तार में ‘माँ’, अर्थात् प्रकृति की भूमिका केंद्रीय है। लेख का मूल संदेश यह है कि सृजन केवल भौतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि चेतना, प्रकृति और माया के समन्वय का परिणाम है। इसकी विशेषता यह है कि यह आधुनिक जीवन में बढ़ते कृत्रिम हस्तक्षेपों के बीच प्रकृति के शाश्वत नियमों की ओर ध्यान आकर्षित करता है। मातृत्व को केवल जैविक अवधारणा नहीं, बल्कि सृष्टि की मूल शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह लेख भारतीय ज्ञान परंपरा की गहनता का प्रभावशाली उदाहरण है।

  • डॉ. लोकेन्द्र सिंह कोट, रतलाम

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