28 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

होली की मस्ती में डूब जाता था जयपुर, जनाना सरदारों की महफिल में तवायफें सुनाती थी मुजरा #khulkekheloholi

जनाना महलों में महाराजा खेलते थे होली...

2 min read
Google source verification

जयपुर

image

Dinesh Saini

Feb 28, 2018

royal Holi

जयपुर। एक जमाने में चन्द्र महल में होली का डांडा स्थापित होने के साथ ही शहर और जयपुर रियासत सहिनत पूरा ढूंढाड़ होळी की मस्ती के रंग में सरोबार हो जाता था। चौकडिय़ों के मोहल्लों में चंग और ढप के साथ अलगोजों की धमाल गूंजने लगती। फागण के महीने की मस्ती का आलम इस कदर छा जाता कि शाम ढलने के बाद लोग घरों में नहीं ठहरते थे। वे ठंडाई छानते और देर रात तक चंग की टोलियों के बीच मस्ती भरे लोकगीतों का आनन्द उठाते। कई हवेलियों में बहुएं भी सास ससुर व जेठ जेठानी को धोखे से कमरे में बंद करने के बाद लाडू,जलेबी और पेड़ा मंगाने का आश्वासन नहीं मिलने तक उनके सम्मान में रसीले गीत गाती रहती। खाली बटुवा और रुपए भी सडक़ पर रखकर छुप जाते और उसे उठाने वाले की खिल्ली उड़ाते थे। वहीं, रात को साइकिल की टयूब को रस्सी से बांधकर सरकाते और सांप-साप चिल्लाते हुए राहगीरों को डराते थे। घूंघट काढ़े महिलाएं कमानीदार झरोखों से होळी धमाल सुनती थी।

अमरीका के राष्ट्रपति की पत्नी
होली के दिनों में राजमहल पैलेस में ठहरी अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति की पत्नी जैकलीन कैनेडी भी धमाल को सुनने रात को पांच बत्ती चौराहे पर पंहुच गई थी। तब राज महल में संगीत की महफिलें सजती थीं। खिड़कियों व झरोखों से सजी धजी महिलाएं गुलाल गोटे व पिचकारियों के रंग से लोगों को भिगोती। राजपरिवार की जनानी ड्योढी में तो धुलंडी के दिन सतरंगी पानी का दरिया बह उठता।

Read More: राजस्थान की अनोखी होली यहां रंग-गुलाल नहीं पत्थरों से खेली जाती थी होली, सिर फूटना होता था शुभ

जनाना महलों में महाराजा खेलते थे होली
महाराजा जनाना महलों में रंग खेलने आते। सजी धजी दावडिय़ा और दासियां महाराजा के स्वागत में पलक-पांवड़े बिछा देती। होली के मदनोत्सव में संगीत नृत्य की मजलिस से निकली गायिकाओं की स्वर लहरियों से ढ्योडी के गलियारों का मिजाज और भी खुशनुमा हो जाता था। ढ्योडी के हौज में केसर के साथ घुले प्राकृतिक रंग को ढोलचियों से एक दूसरे पर अदब कायदे के साथ डालते। गुलाल गोटों के अलावा मछली और मगरमच्छों की आकृति में बनी पीतली की पिचकारियों से रंगों की बौछारें होती थी।

Read More: राजस्थान में यहां होलिका दहन के बाद तीन दिन खेली जाती है होली पुरुषों पर बरसते है कौड़ें

सजती थी तवायफों की महफिल
जनाना सरदारों की महफिल में तवायफें भी फागुनी वस्त्र रेशमी पिशवाज और शरारा पहन मुजरा सुनाती थीं। तबले की ठुमक के साथ सारंगी के तार भी झनाझना उठते। ढोलनियां राजस्थानी मांड सुनाती तब सन्नाटा सा पसर जाता। चांदी का वर्क चढ़ी बरफी को चांदी की तश्तरियों को राज दरबार में बहुत ही सलीके से परोसा जाता था। दरबार के मूड के हिसाब से संगीत नृत्य की महफिल सजती। गोविंददेवजी का दर्शन कर हाथी पर बैठे महाराजा का शाही जुलूस फाग खेलने शहर में निकलता था। उस समय महाराजा पर कोई भी गुलाल नहीं लगा सकता था। सवाई मानसिंह ने 13 मार्च, 1931 को महाराजा पर भी गुलाल लगाने का फरमान जारी किया। बांस की छबडिय़ों में रखी गुलाल को रेशमी कपड़े से ढक कर गाजे बाजे के साथ मंदिरों में भेजा जाता।

महाराजा ने फर्श पर अशर्फियां बिछाकर खेली
सिटी पैलेस और शहर के दरवाजों पर शहनाई वादन होता था। सवाई माधोसिंह ने 1903 की होली वृंदावन के ब्रह्मचारी मंदिर में संत गोविंदराम महाराज के साथ फर्श पर अशर्फियां बिछाकर खेली। इस महात्मा ने माधोसिंह को ढूंढाड़ का राजा बनने की भविष्यवाणी की थी। होली के पहले नवजात शिशुओं का ढूंढ भी पूजा जाता था।

बड़ी खबरें

View All

जयपुर

राजस्थान न्यूज़

ट्रेंडिंग