
बात वर्ष 2019 में फरवरी माह की है। मौका था कांग्रेस के अग्रिम संगठन कांग्रेस सेवादल के अजमेर में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन का। इन दिनों भारत जोड़ो यात्रा के तहत पदयात्रा कर रहे राहुल गांधी तब कांग्रेस अध्यक्ष थे। अपने संबोधन में राहुल गांधी ने सेवादल को कांग्रेस में उचित आदर नहीं मिलने के लिए माफी मांगी थी। तब सेवादल कार्यकर्ताओं से भी कहा था कि कांग्रेस में आपकी जगह और जो आदर है वह नहीं मिला।
साथ ही इस बात के लिए भी माफी मांगी थी कि बिहार की एक सभा में उन्होंने पार्टी के सभी अन्य अग्रिम संगठनों का नाम लिया पर सेवादल का नहीं। सेवादल की चर्चा इसलिए भी प्रासंगिक हो गई है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी के लिए परोक्ष रूप से संगठन की मजबूती का काम कर रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कांग्रेस के अग्रिम संगठन कांग्रेस सेवादल का गठन एक ही दौर में दो साल के अंतराल में हुआ था।
आरएसएस खुद को राजनीति से अलग रखने की बात कहती आई है। लेकिन सब जानते हैं कि यह संगठन भाजपा को सत्ता के दरवाजे तक लाने में कितना अहम है। नागपुर में वर्ष 1925 में विजयदशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना हुई तो इससे दो साल पहले ही वर्ष 1923 में बने हिंदुस्तान सेवादल को बाद में कांग्रेस सेवादल का नाम दिया गया। संयोग यह भी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और सेवादल के संस्थापक डॉ. नारायण सुब्बाराव हार्डिकर दोनों सहपाठी थे।
भले ही राहुल गांधी व कांग्रेस के अन्य नेता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानी आरएसएस को लेकर आक्रामक रवैया अपनाते रहे हैं लेकिन सच यह भी है कि कांग्रेस के पास आरएसएस का मुकाबला करने के लिए कोई दमदार पासा नहीं है।
वह दौर था जब सेवादल के संस्थापक डॉ. नारायण सुब्बाराव हार्डिकर को भी जवाहरलाल नेहरू ने राज्यसभा में भेजा था। खुद राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत कांग्रेस महामंत्री रहने के दौरान सेवादल प्रभारी रह चुके हैं। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, पूर्व केन्द्रीय मंत्री तारिक अनवर, उत्तरप्रदेश के पूर्व मंत्री उमाशंकर तिवारी, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुरेश पचौरी, रामेश्वर नीखरा, महेन्द्र जोशी, प्रहलाद यादव सरीखे सेवादल से निकले नेताओं को पार्टी ने सत्ता व संगठन दोनों में समय-समय पर मौका दिया है।
Published on:
06 Oct 2022 11:16 pm
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