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Shardiya Navratri 2023: 16वीं शताब्दी में जैसोर से लाई गई शिला, दिया महिषासुर मर्दिनी का रूप, आज देशभर से आते हैं भक्त

Shardiya Navratri 2023: आमेर से दुर्गापुरा तक जय मातादी... जय मातादी, सब मिल बोलो जय मातादी... की गूंज। 16वीं शताब्दी में जैसोर (बंगाल) से लाई गई शिला से महिषासुर मर्दिनी का रूप साकार हुआ। जयपुर राजपरिवार के कछवाहा वंश की आराध्य देवी शिला माता आज जयपुरवासियों की भी आराध्य देवी बन गई है।

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Shardiya Navratri 2023: जयपुर। आमेर से दुर्गापुरा तक जय मातादी... जय मातादी, सब मिल बोलो जय मातादी... की गूंज। आमेर शिला माता हो या दुर्गापुरा स्थित दुर्गा माता, नवरात्र में यहां लोग उमड़ रहे है। 16वीं शताब्दी में जैसोर (बंगाल) से लाई गई शिला से महिषासुर मर्दिनी का रूप साकार हुआ। जयपुर राजपरिवार के कछवाहा वंश की आराध्य देवी शिला माता आज जयपुरवासियों की भी आराध्य देवी बन गई है।

जानकारों की मानें तो आमेर रियासत (जयपुर स्थापना से पहले) के शासक रहे मिर्जा राजा मानसिंह प्रथम 16वीं शताब्दी में जैसोर बांग्लादेश से शिला लेकर आए, यहां के मूर्तिकारों ने माता को महिषासुर मर्दिनी का रूप दिया। अष्ट भुजा वाली शिला देवी महिषासुर को एक पैर से दबाकर दाहिने हाथ के त्रिशूल मार रही है। इस मूर्ति के ऊपरी भाग में बाएं से दाएं तक अपने वाहनो पर आरुढ गणेश, ब्रह्मा, शिव, विष्णु व कार्तिकेय की मूर्तियां है। माता की दाहिनी भुजाओं में खडग, चक्र, त्रिशूल, तीर और बाई भुजाओं में ढाल, अभयमुद्रा, मुण्ड, धनुष है। शिलादेवी के बाई ओर अष्टधातु की हिंगलाज माता प्रतिष्ठित है।

आज भी होती दो घंटे तांत्रिक पूजा
मंदिर पुजारी बनवारी लाल शास्त्री कहते है कि माता के आज भी रोजाना दो घंटे सुबह 8 से 10 बजे तक तांत्रिक विधि से पूजा की जाती है। नियमित माता के तीन आरती होती है, सुबह 10 बजे और शाम को सूर्यास्त के समय आती होती है, जबकि शयन आरती रात 8 बजे होती है। माता के दर्शन रोजाना सुबह 6 से दोपहर 12 बजे और शाम 4 से रात 8 बजे तक खुले रहते है।

चांदी व जरी की पोशाक होती धारण
शिला माता को आज भी जरी और चांदी की पोशाक धारण करवाई जाती है। हालांकि यह पोशाक पारंपरिक होती है, जिसे पूर्व राजपरिवार की ओर से धारण करवाया जाता है। मंदिर पुजारी बनवारी लाल बताते है कि माता को आम दिनों में चांदी की लेस लगी हुई पोशाक धारण हो रही है, जबकि नवरात्र में 9 दिन जरी की विशेष पोशाक धारण होती है। शिला माता को प्रतिदिन भोग लगने के बाद ही मंदिर के पट खुलते हैं। माता को भक्त विशेष रूप से तैयार गुजियों का भोग लगाते है।

नवदुर्गा व दस महाविद्याएं भी मौजूद
शिला माता मंदिर का मुख्य द्वार चांदी का बना हुआ है। इस पर नवदुर्गा शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिद्धिदात्री विराजित है, वहीं दस महाविद्याओं के रूप में काली, तारा, षोडशी, भुनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर, भैंरवी, धूमावती, बगुलामुखी, मातंगी और कमला भी विराजित है। दरवाजे के ऊपर लाल पत्थर की गणेशजी की मूर्ति प्रतिष्ठित है।

मूर्ति बनाने के बाद बची शिला आज भी मौजूद
जयपुर फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष रहे इतिहासकार सियाशरण लश्करी कहते हैं कि मानसिंह प्रथम बंगाल से बड़ी शिला लेकर आए थे, इस शिला से माता की मूर्ति तैयार होने के बाद बची हुई शिला आज भी मंदिर के प्रथम भूतल में है, वहीं दूसरे भूतल में नीलम की मूर्ति विराजित है। शिला माता के मंदिर में मार्बल और दरवाजे पर पत्थर पर बने पत्तों का काम तत्कालीन राजा रहे मानसिंह द्वितीय की महारानी मरुधर कंवर ने करवाया है, जो आज भी मंदिर की शोभा बढ़ा रहे है।

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आमेर को दिया नाम
जानकारों की मानें तो शिला देवी मूलतः अम्बा माता का ही रूप हैं। आमेर या आंबेर का नाम इन्हीं अम्बा माता के नाम पर ही पड़ा था, जो कालान्तर में आम्बेर या आमेर हो गया। आमेर महल में जलेब चौक के दक्षिणी भाग में शिला माता का ऐतिहासिक मंदिर है। माता की प्रतिमा एक शिला पर उत्कीर्ण होने से शिला देवी कहा जाता है। शिला माता मंदिर में वर्ष में दो बार चैत्र और आश्विन के नवरात्र में मेला भरता है।