Rakhi Hajela
स्कूलों में समर ब्रेक चल रहा है और बच्चों की छुट्टियां शुरू हो चुकी हैं, ऐसे में कुछ बच्चे अपने दादी-नानी के घर गए हैं तो कुछ समर कैम्प में कुछ नया सीख रहे हैं, लेकिन कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जिन्होंने परिंदों की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाए हैं। यह वह एचआईवी पॉजिटिव बच्चे हैं जिन्हें आज भी समाज खुले मन से स्वीकार नहीं करता। रेज आशा की एक किरण चिल्ड्रन होम में रहने वाले इन तकरीबन 31 बच्चों की भी स्कूल की छुट्टियां चल रही हैं। ऐसे में यह बच्चे अपने समर ब्रेक का सदुपयोग करते हुए अब परिंदों के लिए अपने हाथ से घोंसला तैयार कर रहे हैं। जिन्हें शहर के विभिन्न गार्डन और मंदिरों में परिंडे के साथ लगाया जाएगा। इनमें छह से 18 साल तक के बच्चे शामिल हैं।
मंदिरों से ला रहे नारियल की छाल
बच्चे सुबह-सुबह आसपास के मंदिरों में जाते हैं, जहां नारियल चढ़ाया जाता है। वहां से सूखे नारियल की छाल लाकर उसे कूटने का काम भी करते हैं, जिससे इसे आकार दिया जा सके। इससे पहले वह बांस की लकडिय़ों को एक खास आकार देकर रिंग बनाते हैं जिससे घोंसले का आधार तैयार होता है। इसके बाद कूटे गए नारियल की छाल कोपुराने कपड़ों के साथ बांस की लकड़ी से तैयार आकृति पर बांधा जाता है। नारियल की छाल को पानी से हल्का गीला किया जाता है जिससे यह आसानी से आकार लेता है और इसके बाद परिंदे के अंदर आने के लिए जगह भी बनाई जाती है।
गार्डन में लगाए जाएंगे घोंसले
इन बच्चों को समर ब्रेक में घोंसला बनाने का काम सिखा रही चेतना अग्रवाल के मुताबिक बच्चों ने तकरीबन दो हजार घोंसले बनाने का टारगेट लिया है। जिन्हें गार्डन और मंदिरों में परिंडों के साथ ही लगाया जाएगा, जिससे चिडिय़ा को अपना घर मिल सके।