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ये कैसा अस्पताल! मरीज आते ही पर्ची पर लिख देते हैं ‘रैफर’

राजकीय सामुदायिक चिकित्सालय के हाल-बेहाल...

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जयपुर

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Dinesh Saini

Oct 26, 2017

Hospital

बांदीकुई/जयपुर। यदि आप सडक़ दुर्घटना में चोटिल है या शरीर की कोई हड्डी में विकार है या फिर सोनोग्राफी करवानी है तो बांदीकुई के राजकीय सामुदायिक चिकित्सालय में जाकर समय खराब करना बेकार है क्योंकि यहां सोनोग्राफी का सोनोलॉजिस्ट का पद करीब तीन साल से रिक्त है। वहीं हड्डी रोग विशेषज्ञ का करीब सात वर्ष से रिक्तपड़ा हुआ है। मरीजों को सोनोग्राफी के लिए निजी चिकित्सालयों की शरण लेनी पड़ रही है। वहीं दूसरी ओर मरीजों को निजी चिकित्सालयों में अपनी जेब ढीली करवानी पड़ रही है।

बांदीकुई को उपखंड का दर्जा प्राप्त है तथा बांदीकुई को हृदय स्थल कहा जाता है। ऐसे में यहां सरकार की ओर से चिकित्सा सुविधा के लिए वर्षों से राजकीय सामुदायिक चिकित्सालय संचालित है। करीब तीन साल पूर्व चिकित्सालय में कार्यरत सोनोग्राफी चिकित्सक को प्रशिक्षण के लिए विभाग द्वारा जयपुर भेजा गया था। इससे सोनोग्राफी कक्ष पर तीन साल से ताला लटका हुआ है। सोनोग्राफी नहीं होने से लोगों को परेशानी हो रही है। मरीजों ने बताया कि दूर-दराज से उपचार के लिए बांदीकुई चिकित्सालय में आते हैं। जहां पेट की बीमारी, गर्भवती महिलाओं की जांच आदि के लिए सोनोग्राफी जांच लिखी जाती है लेकिन चिकित्सालय में सोनोग्राफी नहीं होने से उन्हें परेशानी होती है।

बाजार में महंगे दामों पर 700-800 रुपए खर्च कर सोनोग्राफी करवानी पड़ती है और जांच करवाकर पुन: चिकित्सक को रिपोर्ट दिखाने के लिए आना पड़ता है। इससे समय एवं धन की बर्बादी होती है। ऐसे में अधिकांश मरीज तो निजी चिकित्सालयों की ही शरण लेने को मजबूर है। गौरतलब है कि बांदीकुई सरकारी चिकित्सालय के अलावा ब्लॉक में कहीं भी सरकारी स्तर पर सोनोग्राफी की सुविधा नहीं है।

आशा बदली निराशा में
चिकित्सालय में कार्यरत चिकित्सक डॉ. सुरेश गुप्ता के प्रशिक्षण में जाने के दौरान लोगों में आस जगी थी कि चिकित्सक के प्रशिक्षण से आने के बाद सोनोग्राफी पुन: शुरू हो सकेगी। लेकिन चिकित्सा सूत्रों के अनुसार उक्त चिकित्सक को सरकार द्वारा प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद अन्यत्र लगा दिया है। ऐसे में चिकित्सक के नहीं होने से आशा निराशा में बदलती दिखाई दे रही है। इस बारे में यहां के जनप्रतिनिधि, विभागीय अधिकारी एवं प्रशासन को कारगर कदम उठाना चाहिए। लेकिन किसी ने आज तक सुध नहीं ली। मरीजों का शोषण हो तो हो। उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं है।

भटकते रहते हैं बीपीएल
भले ही सरकार ने बीपीएल धारकों को उपचार एवं जांच के लिए सरकारी चिकित्सालयों में निशुल्क व्यवस्था कर रखी हो। लेकिन स्थानीय चिकित्सालय में सोनोग्राफी जांच के लिए उन्हें भटकना पड़ता है तथा अधिक राशि देकर बाहर बाजार में जांच करवानी पड़ती है। हालांकि सरकार ने भामाशाह स्वास्थ्य योजना शुरू कर रखी है।

अस्पताल में महिला चिकित्सक का अभाव
चिकित्सालय में स्त्री रोग विशेषज्ञ तो है लेकिन महिला चिकित्सक नहीं है। चिकित्सालय में शहर के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों से भी मरीज यहां आकर उपचार कराते है।लेकिन महिला चिकित्सक के अभाव में महिलाओं को उपचार में परेशानी आती है।गर्भवती महिला सहित अन्य महिलाओं को पुरूष चिकित्सक को अपनी बीमारी बताने में हिचकिचाहट महसूस होती हेै।

सिर्फ रैफर ही सहारा
चिकित्सालय में हड्डी रोग विशेषज्ञ की कमी भी हमेशा खलती है। चाहे सडक़ दुर्घटना में सामान्य फै्र क्चर हो या हड्डी से संबंधित अन्य कोई बीमारी। हर किसी को रैफर कर दिया जाता है। मरीजों ने बताया कि यहां चिकित्सालय में पूर्व में हड्डी रोग विशेषज्ञ के रूप में डॉ. महेश वशिष्ठ कार्यरत थे। लेकिन उनका तबादला हो जाने के बाद करीब सात साल से हड्डी रोग विशेषज्ञ नहीं लगा है। ऐसे में चिकित्सालय में असुविधाओं की कमी को देखने के बाद सरकार के प्रयास खोखले साबित होते दिखाई देते हैं।