
कहानी-अब मेरी आंखों में आंसू थे- डॉ. पद्मजा शर्मा
'ममा ,हमारे कपड़े जमा दो। मुझो वो काला वाला बैग देना। निन्नी को अलग बैग देना।' अंकिता ने निन्नी की ओर शरारती अंदाज में देखते हुए कहा।
'नहीं नहीं, दीदी के साथ ही मेरे कपड़े रखना।' उसने कुछ कुछ रूठते हुए कहा।
'किताबें भी रखूं?' मैंने छेड़ा तो अंकिता बोली-'नो स्टडी,नो बुक्स, नो टेंशन ...खेलना, खाना, सोना, घूमना बस।'
निन्नी 'हिप हिप हुर्रे' कहते हुए मोहल्ले की सखियों के बीच दौड़ गई। यह सूचना देने कि वे अपने मौसाजी के साथ कल जयपुर जा रही है।
बड़े दिनों की छुट्टियां हो चुकी थीं। अंकिता और निन्नी को लेने उनके मौसाजी जयपुर से आ गए थे। बेटियां जाने के लिए उत्साहित थीं। वहां उनकी हम उम्र अदिती और शिवानी जो थीं।
उन्हें खुश देखकर मैं भी खुश थी। अंकिता को नया नाइट सूट चाहिए था। अब तक 'वन पीस' पहन रही थी। अब उसे टू पीस चाहिए। बड़ी हो रही है। निन्नी को नई बैलीज चाहिए। नरसों उसके स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम था। वहां भूल आई थी। हम नाइट ड्रेस और बैलीज ले आए। बैग तैयार हो गया। मैंने रात को उनसे कहा किसी चीज की जरूरत हो तो अभी बता दो। सुबह ला सकते हैं।
'नहीं,नहीं चाहिए कुछ भी।' अंकिता ने कहा। मैंने महसूस किया जो उल्लास अंकिता की आवाज में दोपहर के समय था वह अब रात को नहीं है। खैर ....बच्चे हैं। छुट्टियां हैं। खेलते खेलते थक जाते हैं। नींद आ रही होगी। यूं ही लगा होगा मुझो। कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं ही इनके जाने के खयाल से विचलित हो रही हूं। इस तरह सोच विचार चलता रहा। सुबह मैं उन्हें हिदायतें दे रही थी। मौसी को तंग मत करना।
'ठीक है।' अंकिता ने माथे पर सलवटें डालते हुए कहा और तेजी से कमरे से बाहर निकल गई। छोटी मेरे पास बैठी रही। कुछ पल बाद वह मेरे गले में झाूल गई और बोली 'ममा, हमारे बिना आपका मन लग जाएगा?'
नौ वर्षीय निन्नी ने जब यह कहा तो उसकी आंखों में उदासी के भाव साफ दिख रहे थे।
'बेटा, तुम घर से घर में ही जा रही हो और एक सप्ताह की तो बात है। तुम्हारा मन न लगे तो फोन कर लेना। फिर भी न लगे तो मौसाजी को कहना वे छोड़ जाएंगे। हमारा मन न लगा तो हम आ जाएंग।' मैंने उसे प्यार से समझााया तो वह बोली -'वो बात नहीं ममा। मैं तो यह जानना चाहती हूं कि अपने बच्चों के बिना उनके ममा पापा का घर में मन लग जाता है क्या?'
मैं कुछ कहती उससे पहले उसकी सहेलियां चहकती-फुदकती हुई आ गईं और पूछने लगीं-'अरे निन्नी तू सचमुच जयपुर जा रही है?'
'हां' उसने इतराते हुए कहा।
बस ढाई बजे की थी। एक बज रहा था। बेटियों ने ग्यारह बजे नाश्ता किया था। अब उन्हें भूख नहीं थी। खाना बस में खाने की बात हो गई। उनका ऑर्डर था कि हमारे लिए देशी घी के करारे परांठे और छोटे आलू की जीरा छौंक वाली सूखी सब्जी टिफिन में रख देना। जब मैं खाना पैक कर रही थी तब अंकिता रसोई में मेरे करीब आकर बोली -'ममा, मेरे परांठों में नमक- मिर्च क्यों नहीं डाला? मैं फीके परांठे नहीं खा सकती।'और कहते-कहते वह सुबकने लगी।
मेरे हाथ रुक गए। आश्चर्य हुआ। मैंने उसे अपने से चेपते हुए पूछा -'मेरी बेटी रोई क्यों?'
अब वह पहले से भी जोर से रोने लगी और बोली -'मुझो जयपुर नहीं जाना है।'
मैं देर तक उसे बहलाती-मनाती रही। छुट्टियों में जयपुर जाने की योजना तुम्हारी ही थी। तुम्हारे कहने पर ही मौसा जी आए हैं। अब नहीं जाओगी तो उन्हें लगेगा कि हम तुम्हें भेजना नहीं चाह रहे हैं। उधर वो बहनें भी निराश और नाराज हो जाएंगी। वे फिर अपने घर कभी नहीं आएंगी।
'कौन बहनें?' उसने गुस्से में पूछा।
'अदिती और शिवानी।' मेरे ये नाम लेते ही वह चिढ़ सी गई,बोली -'आपको सबकी परवाह है बस हमारी नहीं है। निन्नी जाए तो उसे भेज दो। मैं नहीं जाऊंगी।' उसने आंसू पोंछते हुए कहा।
इतने में निन्नी दौड़ते हुए आई-'ममा, पापा के साथ का अपना एक फोटो देना। मुझो रास्ते में आपकी और पापा की याद आई तो उसे देखूंगी।' उसका स्वर रुआंसा था।
'इस ड्रामेबाज को कुछ मत देना। फोटो गिरा देगी कहीं।' अंकिता ने कहा तो दोनों में बहस होने लगी।
मैं फोटो ले आई। निन्नी को दी। वह खुशी से उछल पडी। फोटो लेकर बाहर दौड़ गयी।
मैंने अंकिता के बालों में हाथ फिराया और पूछा-'अपना टूथ ब्रश रख लिया ?'
उसने बेमन से कहा -'भूल गई। अभी रखती हूं।'
'निन्नी का भी रख लेना।'- मैंने कहा तो बोली-'मैं नहीं रखती निन्नी का। कहो उसे वह खुद रखेगी।
पौने दो बज रहे थे। ऑटो रिक्शा आ चुका था। निन्नी कई बार पूछ चुकी थी-'पापा हमें बस स्टॉप तक छोडऩे नहीं आएंगे क्या?'अंकिता तो नाराज थी ही। बोली-'बस, पापा को तो अपने ऑफिस की लगी रहती है दिन भर। कोई आए कोई जाए उनकी बला से।'
मैंने उन्हें फोन किया। वे बोले -'तुम चलो। मैं दो सवा दो तक बस स्टॉप पर ही मिलता हूं।' पापा का जवाब सुनकर दोनों को बुरा लगा।
ऑटो में हमारी कोई बात नहीं हुई। मैं बीच में बैठी थी निन्नी मुझासे चिपक कर बैठी थी। अंकिता मेरे कंधे पर अपना सिर टिकाए थी।
बस में मौसाजी के साथ बुझो मन से दोनों बैठ गईं। निन्नी खिड़की के पास थी। मैं नीचे खड़ी थी। वह खिड़की से मेरी ओर चुपचाप देख रही थी। जैसे कि मेरे चेहरे को पढ़ रही हो कि मुझो उनसे बिछडऩे की पीड़ा है कि नहीं। और है तो कितनी। मैंने उसे हंसकर कहा-'क्या देख रही है निन्नी। खुश रहना।' उसने थूक गटक लिया। तभी उसे पापा आते दिखाई दे गए।
'पापा, पापा' करते हुए वह बस से नीचे उतर आई। इन्होंने अपना बैग टांगों के बीच रखते हुए निन्नी को गोद में उठा लिया। उसके गालों पर प्यार किया। वह भी पापा के गले में बाहें डालकर उनके चेहरे पर अपना चेहरा रगडऩे लगी। फिर कान में बोली-'पापा, पापा दीदी अभी तक रो रही है। उसे नहीं जाना जयपुर।'
इन्होंने पूछा 'तुझो जाना है कि नहीं?'
'दीदी जो कहे।' वह अंकिता को देखते हुए कह रही थी।
इन्होंने निन्नी को गोदी से नीचे उतारा। मैंने कहा-'दोनों का ही मन नहीं है। वो देखो अंकिता तो तब से रोए ही जा रही है। चुप ही नहीं हो रही, जैसे कोई सजा काटने जा रही है। इन्हें घर ले चलो। शैलेश जी को मैं समझाा दूंगी। अगर वहां मन नहीं लगा तो इन्हें भागना पड़ेगा।'
पति बोले-'बच्चियां हैं। पहली बार घर से दूर जा रही हैं। धीरे- धीरे मन लग जाएगा।'
मैं अंकिता के पास जा ही रही थी बस में कि वह खुद ही आ गई। वह मेरे कंधे पर अपना सिर टिकाकर अपने पापा से बोली-'आप मौसा जी से कह दो कि हमें कल ही यहां छोड़ जाएं। और जब भी मेरा मन करेगा मैं यहां फोन करूंगी। वे रोकेंगे नहीं।'
'ठीक है कह देता हूं।' पति ने देखा शैलेश जी भी बस से उतरकर हमारे पास आ गए। उन्होंने आते ही कहा-'अंकिता, निन्नी तुमसे छोटी हैं। फिर भी हंस रही है और तुम इससे चार साल बड़ी हो कर भी रो रही हो। देख रहा हूं ऐसे रोए जा रही हो जैसे ससुराल जा रही हो, गांव की कोई लड़की।'
अंकिता ने मेरी साड़ी के पल्लू से अपने आंसू पौंछे। और गर्दन नीचे कर के हलके से मुस्कराई। निन्नी ससुराल नाम सुनकर ताली बजाकर हंसने लगी। तभी अंकिता ने उसकी तरफ आंखें तरेरी। वह मेरी ओट लेकर सहमकर खडी हो गई। मौसा जी अंकिता से बातें करने लगे। पिछली छुट्टियों की, स्कूल की,पढ़ाई की,खेलों की, नंबरों की,जयपुर में घुमाने की, होटल ले जाने की।
इधर निन्नी पापा से डिमांड कर रही थी -'पापा कुछ दिलाओ न।'
'क्या?'
कुछ भी .
फिर भी? कुछ का नाम तो होगा कुछ?
कुछ भी यार पापा। अच्छा चिप्स?
नहीं।
अच्छा फू्रटी ?
नही।
तो चॉकलेट?
ढाई बज गए थे। ड्राइवर अपनी सीट पर आ चुका था। हॉर्न बज चुका था। बस छूटने वाली थी। इन्होंने उसे डपट दिया कि बाहर की चीजें नहीं खाते। वह छोटे से मुंह से मेरी ओर देखने लगी। मैं भागकर पास की दुकान से उनके लिए दो फ्रूटी, दो चिप्स के पैकेट ले आई। निन्नी ने कहा -'मेरी अच्छी ममा। गंदे पापा।' अंकिता ने कोई खुशी नहीं जताई। मैंने दोनों बेटियों के बालों में हाथ फिराया।
वे बस में बैठ चुकी थीं। दोनों खिड़की से देख रही थीं। रो रही थीं। आंसू पौंछ रही थीं। बस रवाना हो गई। वे दूर तक हाथ हिलाती रही। मैं भी उदास थी। घर आकर हमने खाना खाया। ये दफ्तर चले गए। मैं बचे काम को सलटाने लगी। सारा घर बिखरा था समेटा। रात को किसी शादी में जाना था। साढ़े आठ बज रहे थे। बस ठीक समय पर हुई तो अब तक पहुंच गई होगी जयपुर। यह सोचकर मैंने इन्हें फोन करने के लिए कहा तो बोले-'तू भी कमाल करती है। सरकारी बस भी कभी समय पर पहुंची है। नौ बजे के आसपास पहुंचेगी। तब फोन करेंगे।'
ये न्यूज देख-सुन रहे थे टी वी पर। मैं फोन के पास बैठी थी कि शायद बच्चियों के पहुंचते ही बहन फोन कर दे। नौ बजे बहन का फोन आ ही गया कि सब ठीक से पहुंच गए हैं। बच्चियां मस्त हैं।
'क्या कर रही हैं वे?' मैंने पूछा तो उधर से शैलेश जी बोले-'उन्हें किसी की कोई याद वाद नहीं आ रही है। वहां और यहां की स्थितियों में बहुत बदलाव आ गया है। आपको बात करनी है क्या उनसे? वे सब धमाचौकड़ी मचा रही हैं।'
मैंने कहा-'नहीं, नहीं, मैं तो ऐसे ही पूछ रही थी। आप लोगों को तंग न कर रही हों।
मैंने इस समय बात करना उचित नहीं समझाा। कहीं मेरी आवाज सुनकर रो न दें। मैंने इन्हें बताया तो बोले-'मैं न कहता था कि यह रोना धोना यहीं तक है। वहां जाकर सब भूल जाएंगी। बच्चों को कभी-कभी अपने से दूर भी करना चाहिए। वे आत्मनिभर बनते हैं। वरना घर घुस्सू बनकर रह जाते हैं। बड़े होने पर भी घर से बाहर पढऩे या काम की तलाश में जाना पड़ ही सकता है।'
हम शादी से ग्यारह बजे लौटे। पति ने कहा 'अब उनसे बात कर लेते हैं।' मैं डर रही थी कहीं हमारी आवाज सुनकर वे उदास न हो जाएं। रोने न लगें। मगर इनका कहना था कि पता तो चलेगा कि उनका मन लगा कि नहीं। हमारे साथ उन्हें भी तसल्ली हो जाएगी कि हमने अपना वायदा निभाया। पति ने फोन किया। जल्दी ही रख भी दिया और कहा उनका मन लग गया है। वे भी उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहते थे। शायद उनका रोना हम में से कोई भी सुनना नहीं चाहता था।
सुबह सोकर उठे तो देखा घर साफ- सुथरा, खाली- खाली है। मेरा मन भी खाली-खाली हो रहा था। लग रहा था जैसे कोई काम ही नहीं है। उनके साथ ही घर का काम और बहुत सारी आवाजें भी चली गई थीं। आज घर में डिस्कवरी चैनल या कार्टून फिल्म की आवाज नहीं थी। उनके लिए दूध नाश्ता नहीं तैयार करना था। उनका खाना भी नहीं बनाना था। उनके कपड़े नहीं धोने थे। छुट्टियों के होमवर्क के लिए पीछे नहीं पडऩा था। उनकी आपसी तू-तू, मैं-मैं नहीं थी। कोई जिद्द,कोई डिमांड नहीं थी। मुझो बार बार हिदायतें नहीं देनी पड़ रही थीं कि नंगे पांव मत घूमो। गर्म कपड़े पहनो। थोड़ी देर धूप में जाओ। अब धूप तेज है,भीतर आ जाओ। नहा लो, खा लो, टीवी के आगे से अब तो हट जाओ। टीवी की आवाज कम करो।
ये दफ्तर जा चुके थे। बारह बज रहे थे। अब घर में मैं थी या टिक टिक करती दीवार घड़ी। मैंने दरवाजे-खिड़कियां खोलीं। बाहर गुनगुनी धूप थी। सामने चौक में बच्चे खेल रहे थे पर बेटियों की सहेलियां दिखाई नहीं दे रही थीं। निन्नी ही है जो सबको घर से निकाल लाती है। मंदिर के पास वाले पीपल से कौवे की कांव कांव के स्वर आ रहे थे। चिडिय़ाओं का एक झाुण्ड आसमान नाप रहा था। दाईं तरफ बंगले की छत पर धूप फैली थी पर नीचे आंगन में छाया थी। खिड़की के पास खड़ी गाय अपनी पूंछ से मक्खियां उड़ा रही थी। एक मोटर साइकिल पर दूध वाला खाली टंकिया लेकर गुजर गया। कहीं कोई उदास गाना बज रहा था। यह उदासी मेरे भीतर उतरे इससे पहले मैंने सारे दरवाजे-खिड़कियां बंद कर दिए।
कौवे की कर्कश आवाज अब भी सुन रही थी। एक अजीब सा सूनापन वातावरण पर तारी था। घड़ी की टिक टिक की कीलें दिमाग में ठुक रही थीं। अचानक लगा जैसे अंकिता रो रही है। निन्नी फोटो को सीने से लगाए उदास खड़ी है। मैंने जयपुर फोन लगाया। फोन अंकिता ने ही उठाया। वह मेरी आवाज सुनकर आश्चर्य से बोली-'अरे ममा, इस समय कैसे? फोन तो रात को करने की बात थी न?'
मैंने कहा-'ऐसे ही कर लिया बेटू। तुम्हारी याद आ गयी। क्या कर रहे हो तुम?'
'ममा, हम तो कैरम खेल रहे हैं। हमने रानी को जीत लिया है। बांदी को निकालना बाकी है।' उसके शब्दों में झाुंझालाहट साफ झालक रही थी।
मैंने कहा-'निन्नी से बात करवा दे।' निन्नी की उधर से आवाज आ रही थी-'दीदी,ममा को बोलो दस मिनट बाद बात करें। अब के बांदी हाथ नहीं आई तो समझाो हम हार गए।'
अंकिता मुझो जवाब देना भूल गई। मैंने कई बार हैलो हैलो किया। वे अपने खेल में मस्त थीं। उधर से कोई जवाब देर तक नहीं आया। तो मैंने फोन रख दिया। अब मेरी आंखों में आंसू थे।

Published on:
07 Jul 2018 04:26 pm
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