
भारत का उच्चतम न्यायालय
उच्चतम न्यायालय ने राजस्थान उच्च न्यायालय के फैसलों को चुनौती देने वाली दो अपीलों को मंजूर करते हुए कहा कि आपराधिक मुकदमों में लागू साक्ष्य अधिनियम के सख्त प्रावधान मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में लागू नहीं होते हैं। राजस्थान उच्च न्यायालय ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण द्वारा दावेदारों को दिए गए मुआवजे को कम कर दिया था।
उच्च न्यायालय ने कहा था कि मृतक के वेतन प्रमाण पत्र और वेतन पर्ची जारी करने वाले व्यक्ति की जांच अधिकरण में नहीं हुई है, जिसके कारण इनको मान्य नहीं किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश कृष्ण मुरारी और न्यायाधीश एस रवींद्र भट्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना के दावों से संबंधित मामले में दावेदारों को साक्ष्य अधिनियम के सख्त प्रावधानों को साबित करने की आवश्यकता नहीं है।
मोटर वाहन अधिनियम, 1988 कानून आम लोगों के मुआवजे व हित के लिए लाया गया है। ऐसे मामलों की सुनवाई के दौरान, दुर्घटना का तथ्य स्थापित हो जाने के बाद, न्यायाधिकरण की भूमिका न्यायपूर्ण और उचित मुआवजा देने की होती है। उच्चतम न्यायालय ने पूर्व में सुनीता और कुसुमलता के मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि एक आपराधिक मुकदमे में लागू सबूत के सख्त नियम, मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में लागू नहीं होते हैं, यानी, ’’सबूत के मानक को ध्यान में रखते हुए संभावना की प्रबलता पर जोर देना चाहिए। इस तरह के मामले में उचित संदेह से परे सबूत का सख्त मानक पालन आपराधिक मामलों की तरह नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने दावेदारों द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों को मृतक की आय के निर्णायक सबूत मानते हुए अधिकरण की ओर से तय मुआवजे को सही माना। उच्चतम न्यायालय ने मुआवजा राशि पर नौ फीसदी वार्षिक ब्याज देने के आदेश दिए हैं।
यह है मामला
मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण कांमा भरतपुर ने 26 अक्टूबर 2018 को एक ही दुर्घटना में दायर दो दावों में 19.64 लाख रुपए सात फीसदी ब्याज सहित मुआवजा देना तय किया। जिसके खिलाफ दायर अपील पर राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर बैंच ने मृतक के न्यूनतम वेतन के आधार पर मुआवजा राशि 8.16 लाख रुपए देने के आदेश दिए। हाईकोर्ट ने मृतक के वेतन तय करने के लिए पेश की गई पे-स्लीप व अन्य दस्तावेजों को नहीं माना। हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
Published on:
10 Dec 2022 08:02 pm
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