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Rajasthan Citizen Power : अब आप भी बचा सकते हैं ‘दम तोड़ती’ अरावली पर्वतमाला को, जानें सुप्रीम कोर्ट तक बात पहुंचाने का आसान तरीका

सुप्रीम कोर्ट की हाई-पावर्ड कमेटी ने अरावली पर्वतमाला को लेकर जनता से मांगे सुझाव। राजस्थान के ग्रामीण, किसान, पर्यावरणविद और माइनिंग ट्रेडर्स 21 दिनों में भेज सकते हैं राय।
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Supreme Court Aravalli Range Committee Public Opinion Rajasthan

Supreme Court and Aravalli Ranges - File PIC

राजस्थान की रीढ़ मानी जाने वाली प्राचीन अरावली पर्वतमाला के संरक्षण और विकास को लेकर महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित हाई-पावर्ड कमेटी ने अरावली पहाड़ियों, पर्यावरण, माइनिंग और स्थानीय जनजीवन से जुड़े मुद्दों पर आम जनता और सभी हितधारकों से लिखित सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की हैं। प्रेस इनफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) द्वारा जारी प्रेस नोट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत बनाई गई यह उच्च स्तरीय समिति राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली में अरावली क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र का व्यापक अध्ययन कर रही है। समिति ने राजस्थान के ग्रामीणों, किसानों, माइनिंग लीज धारकों, खदान मजदूरों, पर्यावरणविदों और स्वयंसेवी संस्थाओं से अगले 21 दिनों के भीतर ईमेल या गूगल फॉर्म के जरिए प्रामाणिक दस्तावेजों के साथ अपने सुझाव और जमीनी फीडबैक भेजने की अपील की है, ताकि 31 अगस्त 2026 से पहले सुप्रीम कोर्ट में एक निष्पक्ष और मजबूत रिपोर्ट पेश की जा सके।

अरावली की सुरक्षा और जनजीवन के बीच संतुलन

सुप्रीम कोर्ट ने स्वप्रेरणा से दर्ज याचिका पर सुनवाई करते हुए 25 मई 2026 को इस हाई-पावर्ड कमेटी का गठन किया था।कमेटी का मुख्य उद्देश्य अरावली पर्वतमाला की पहाड़ियों में अवैध खनन, वन कटाई और उससे जुड़े मुद्दों की गहराई से समीक्षा करना।

बता दें कि अरावली न केवल पर्यावरण के लिए जरूरी है, बल्कि राजस्थान में लाखों लोगों की आजीविका, कृषि, माइनिंग उद्योग और रोजगार भी सीधे तौर पर इससे जुड़े हुए हैं। इसी वजह से कोर्ट ने स्थानीय निवासियों और व्यवसायियों दोनों की राय सुनना जरूरी समझा है।

राजस्थान के इन वर्गों से मांगे सुझाव

अरावली क्षेत्र के पर्यावरण और जैव विविधता से जिन लोगों का जीवन और रोजगार सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है, वे सभी अपनी बात रख सकते हैं।

ग्रामीण और किसान: अरावली बेल्ट के आसपास रहने वाले राजस्थान के ग्रामीण और किसान, जिनके जलस्तर और खेती पर पहाड़ियों का सीधा असर पड़ता है।

माइनिंग लीज होल्डर्स और खदान मजदूर: राजस्थान में पत्थर, मार्बल और खनिज उद्योग से जुड़े लीज धारक और वहां काम करने वाले स्थानीय मजदूर।

पर्यावरणविद और NGOs: पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञ, रिसर्चर्स और गैर-सरकारी संगठन।

आम नागरिक: कोई भी व्यक्ति या संस्था जो इस मामले में वैध हित रखती है या जिसके पास अरावली से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य मौजूद हैं।

21 दिनों की समयसीमा : जानिए कैसे और कहां भेजना है अपना फीडबैक

प्रेस इनफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) के अनुसार, जनता और हितधारकों को अपने सुझाव पूरी तरह से तथ्यात्मक और प्रामाणिक दस्तावेजों के साथ भेजने होंगे।

ईमेल के जरिए: आप अपना पत्र या रिपोर्ट mshpcaravalli[at]gmail[dot]com पर ईमेल कर सकते हैं।

गूगल फॉर्म (Google Form) से: समिति द्वारा जारी विशेष ऑनलाइन गूगल फॉर्म लिंक ([https://forms.gle/FpWwXBES5Gfr9bn16](https://forms.gle/FpWwXBES5Gfr9bn16)) के माध्यम से भी सीधे इनपुट जमा कराए जा सकते हैं।

डेडलाइन: यह पूरी प्रक्रिया नोटिस जारी होने के 21 दिनों के भीतर पूरी करनी होगी।

राजस्थान के लिए क्यों बेहद खास है अरावली पर फैसला?

राजस्थान के भौगोलिक परिदृश्य में अरावली पर्वतमाला का स्थान सबसे महत्वपूर्ण है। यह पर्वत श्रृंखला सिरोही, उदयपुर, राजसमंद, अजमेर, जयपुर, अलवर और झुंझुनूं जैसे राजस्थान के कई जिलों से होकर गुजरती है।

अरावली राजस्थान के थार रेगिस्तान की रेतीली हवाओं को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकती है। अरावली की पहाड़ियां राज्य में मानसून को आकर्षित करने और भूजल स्तर को रिचार्ज करने का काम करती हैं।

राजस्थान के प्रसिद्ध मार्बल, ग्रेनाइट और मिनरल इंडस्ट्री का आधार भी अरावली ही है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की यह रिपोर्ट राजस्थान के पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों की भावी दिशा तय करेगी।

31 अगस्त तक सौंपी जाएगी फाइनल रिपोर्ट

हाई-पावर्ड कमेटी जनता, विशेषज्ञों और राजस्थान सरकार के विभागों से मिलने वाले सभी सुझावों और आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण करेगी। इसके बाद एक समग्र और विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाएगी, जिसे 31 अगस्त 2026 से पहले सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर दिया जाएगा।

इस रिपोर्ट के आधार पर ही अरावली क्षेत्र में माइनिंग, पर्यावरण संरक्षण और निर्माण कार्यों को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत अपना अंतिम फैसला सुनाएगी।

क्यों आई है ऐसी नौबत?

अरावली पर्वतमाला में लगातार हो रहे अवैध खनन, वनों की कटाई, अंधाधुंध निर्माण कार्यों और उससे बिगड़ते पर्यावरण संतुलन को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई थी। इस पर कड़ा संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने पाया कि अरावली न केवल राजस्थान को थार रेगिस्तान के प्रसार से बचाने वाली प्राकृतिक ढाल है, बल्कि यह क्षेत्र के भूजल और जैव विविधता का भी मुख्य आधार है।

ऐसे में पर्यावरण सुरक्षा और स्थानीय लोगों की आजीविका व माइनिंग उद्योग के बीच सही संतुलन बनाने तथा ज़मीनी हकीकत को पारदर्शी तरीके से जानने के लिए सुप्रीम कोर्ट को इस हाई-पावर्ड कमेटी का गठन कर सीधे जनता से राय मांगने की नौबत आई है।