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निम्स की दबंगई को सुप्रीम कोर्ट का झटका, जिएगा रामगढ हटेगा अवैध निर्माण

निम्स यूनिवर्सिटी की याचिका खारिज, 30 तक अवैध निर्माण गिराने का आदेश

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jaipur

जयपुर/नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (निम्स) यूनिवर्सिटी को राहत देने से इनकार करते 8125 वर्ग मीटर जमीन से 30 नवम्बर तक अवैध निर्माण गिराने को कहा है। कोर्ट ने जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) को आदेश दिया है कि अवैध निर्माण गिराने पर आने वाला खर्च निम्स से वसूल किया जाए।

न्यायाधीश मदन बी.लोकुर और न्यायाधीश दीपक गुप्ता की खण्डपीठ ने निम्स यूनिवर्सिटी की दो याचिकाओं को खारिज करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने जमीन पर कब्जे और निर्माण को नियमित करने के निम्स यूनिवर्सिटी के आवेदनों को भी रद्द कर दिया है। कोर्ट ने रामगढ़ बांध में पानी नहीं आने को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा स्वप्रेरणा से दर्ज याचिका पर दिए गए निर्देशों की अब तक पालना नहीं होने को दुर्भाग्यपूर्ण माना है।

न्यायाधीश मनीष भंडारी ने 2011 में रामगढ़ बांध में पानी नहीं आने के बारे में राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित खबरों के आधार पर स्वप्रेरणा से प्रसंज्ञान लिया था। कोर्ट ने बांध में पानी नहीं आने के कारणों को जानने के लिए सीनियर एडवोकेट वीरेन्द्र डांगी और अशोक भार्गव की मॉनिटरिंग कमेटी बनाई थी। कमेटी की रिपोर्ट में निम्स यूनिवर्सिटी के इस अवैध कब्जे और निर्माण का खुलासा किया था, लेकिन कोर्ट के आदेश के बावजूद अधिकारी अब तक इसे हटा नहीं रहे थे।

न्यायाधीश मदन बी. लोकुर की अध्यक्षता वाली बैंच ने खसरा नंबर 526 में बने हॉस्टल को अवैध मानते हुए गिराने का आदेश दिया है। निम्स की दोनों याचिकाओं को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 10-10 लाख रुपए जुर्माना लगाया है। सुप्रीम कोर्ट ने जेडीए को आदेश दिया कि खसरा नंबर 526 पर बने अवैध निर्माण को 30 नवंबर तक राज्य सरकार और जिला कलेक्टर की मदद से गिरा दे। कोर्ट ने डीजीपी को आदेश दिया है कि अवैध निर्माण गिराने में जो भी मदद चाहिए, मुहैया कराएं।

यहां है अवैध निर्माण

निम्स का उक्त अवैध निर्माण रामगढ़ झील के समीप है। यह वही झील है, जो 1982 में दिल्ली में हुए एशियाई खेलों के दौरान महत्वपूर्ण केंद्र था। अब आसपास अतिक्रमण होने के कारण झील में पानी नहीं है। वर्ष 2002 में निम्स ने जयपुर के जिला कलेक्टर को आमेर तहसील के जुगलपुर गांव में जमीन के आवंटन के लिए आवेदन दिया था लेकिन खसरा नंबर 526 के आवंटन के लिए कोई आवेदन नहीं किया था। बाद में 28 फरवरी 2005 को मुख्यमंत्री को खसरा नंबर 526 के आवंटन के लिए पत्र लिखा। उस पत्र का जवाब मुख्यमंत्री की तरफ से अगले 10 साल तक भी नहीं आया।

इसे निम्स ने राज्य सरकार की मौन सहमति समझ लिया और खसरा नंबर 526 के खातेदारों से जमीनें खरीद लीं। लेकिन जेडीए ने फरवरी 2012 में निम्स को अतिक्रमण हटाने के लिए नोटिस जारी किया। इसे निम्स ने जेडीए के अपीलीय ट्रिब्यूनल में अपील दायर की, जो खारिज हो गई। इसके खिलाफ निम्स ने हाईकोर्ट की सिंगल बैंच में अपील की। सिंगल बैंच ने खसरा नंबर 526 को चरागाह मानते हुए राज्य सरकार की जमीन माना और निम्स की अपील खारिज कर दी। सिंगल बैंच के फैसले के खिलाफ निम्स ने डिवीजन बैंच में अपील दायर की। डिवीजन बैंच ने भी निम्स की अपील खारिज कर दी। हाईकोर्ट की डिवीजन बैंच के खिलाफ निम्स ने सुप्रीम कोर्ट में 2012 में अपील की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।