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55 वर्षीय गार्ड ने 23 साल के युवा को दी नई जिंदगी

सीतापुरा स्थित महात्मा गांधी अस्पताल में पहले सफल लिवर प्रत्यारोपण के ठीक आठ दिन बाद रविवार को एक और लिवर प्रत्यारोपण कर दिया गया

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Shankar Sharma

Dec 07, 2015

Jaipur news

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जयपुर.
सीतापुरा स्थित महात्मा गांधी अस्पताल में पहले सफल लिवर प्रत्यारोपण के ठीक आठ दिन बाद रविवार को एक और लिवर प्रत्यारोपण कर दिया गया। शनिवार रात करीब 10 बजे प्रक्रिया शुरू हुई। देर रात करीब 2 बजे लिवर प्रत्यारोपण शुरू किया गया जो रविवार दोपहर 2 बजे तक चला। लगातार 12 घंटे तक चले ऑपरेशन में 55 वर्षीय कैडेवर दानदाता के लिवर को एक 23 वर्षीय मरीज में सफल प्रत्यारोपित किया है। इसके साथ ही राज्य में लिवर प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक और बड़ी सफलता जुड़ गई।


ऑपरेशन टीम के सर्जन
अस्पताल के चीफ लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. गिरिराज बोरा और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ क्रिस्टोफेर बेरी के साथ ही डॉ. दुर्गा जेठवा, डॉ. सुरेश भार्गव इस प्रत्यारोपण में शामिल रहे।

नहीं था और कोई विकल्प
लिवर सिरोसिस से पीडि़त इस युवक के लिए लिवर प्रत्यारोपण के अलावा जान बचाने का और कोई विकल्प नहीं था। प्रत्यारोपण टीम को उम्मीद है कि यह प्रत्यारोपण सफल रहा है। प्रत्यारोपण निशुल्क किया गया।

...और लिवर देने को तैयार हो गए परिजन
अस्पताल के चीफ लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. गिरिराज बोरा ने बताया कि ओमप्रकाश को ब्रेन हेमरेज होने पर 3 दिसम्बर को अस्पताल में भर्ती किया गया था। यहां उसे शनिवार को ब्रेनडेड घोषित किया गया। इसके बाद परिजनो को कैडेवर दान के बारे में जानकारी देने पर वे इस पुण्य के लिए तैयार हो गए। उन्होंने इस सफलता को लिवर प्रत्यारोपण के क्षेत्र में राज्य की अहम उपलब्धि बताया है।

एक किडनी भी प्रत्यारोपित
अस्पताल में श्योपुर निवासी 41 वर्षीय मंजू जांगिड़ को कैडेवर दानादता की एक किडनी लगाई गई। मधुमेह से ग्रसित यह मरीज पिछले 5 साल से डायलेसिस के सहारे जीवत थी। सुबह 4 बजे से 7 के बीच में अस्पताल के चीफ किडनी सर्जन डॉ. टी. सी. सदासुखी की टीम ने ये किडनी प्रत्यारोपण किया। वहीं दूसरी किडनी को कैडेवर दान के नियमों के तहत सवाई मानसिंह अस्पताल में भेजा गया। जहां एक और जरूरतमंद मरीज को किडनी लगाई गई।

... और काम नहीं आया दिल
कैडेवर दानदाता की दोनो किडनियां और लिवर का उपयोग हो गया, लेकिन हृदय काम नहीं आ पाया। दरअसल नियमानुसार एक 23 वर्षीय मरीज में हृदय प्रत्यारोपण करना तय किया गया। इस बीच डॉक्टरों की गहन जांच में पाया गया कि दानदाता मरीज के हृदय में एक गंभीर किस्म की बीमारी थी। दानदाता और दानग्राही की आयु में 22 साल का अंतर होने, दानदाता के हृदय में रोग होने और दोनो के वजन में काफी अंतर होने के कारण हृदय प्रत्यारोपण नहीं हो पाया।

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