
कश्मीर: अजीब दास्तां बन गई है
जम्मू-कश्मीर को धरती पर स्वर्ग कहा जाता रहा है। लेकिन पिछले कई दशकों से यहां पर दहशत ने डेरा जमाया हुआ है। सरहद पार से आतंक कंटीले तारों की बाड़ को चीर कर अमन की राह में बाधक बना हुआ है। एक के बाद एक कई सरकारें केंद्र और जम्मू-कश्मीर में रहीं, सभी ने दावा किया कि हालात सुधारेंगे, लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं। यों कहें कि और बदतर हो रहे हैं। बड़ा सवाल है कि आखिर कश्मीर की समस्या का सियासी हल किसी के पास है या फिर पीढ़ी दर पीढ़ी इसका दंश भुगतती रहेगी। नियंत्रण रेखा यानी एलओसी हो या फिर अंतरराष्ट्रीय सीमा। आए दिन घुसपैठ और फायरिंग की घटनाएं होती रहती हैं। केंद्र में एनडीए सरकार की ओर से पाकिस्तान के साथ शांति की पहल की गई, लेकिन कोई कारगर हल नहीं निकल सका। फिर चाहे वो शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को बुलाना हो या फिर लाहौर की सरप्राइज विजिट हो। भाजपा ने जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन की सरकार बनाने का फॉर्मूला भी आजमाया, लेकिन विचारधारा में बड़ा अंतर होने के कारण ये सियासी रिश्ता ज्यादा नहीं चल पाया। आज हालात ये है कि जम्मू-कश्मीर मेंं राज्यपाल शासन है।
दोनों देशों की सियासत में कश्मीर अहम
कश्मीर भारत और पाकिस्तान की सियासत का अहम मुद्दा है। जिस प्रकार से भारत में अनुच्छेद 370 और 35 ए का नाम लेते ही सियासत गर्म हो जाती है, उसी प्रकार पाकिस्तान में भी कश्मीर को लेकर सियासी पारा अचानक ही उछाल मारने लगता है।
हालिया घटनाओं से मुद्दा सरगर्म
भारतीय जवान के शव को क्षतविक्षत करने की घटना और शुक्रवार को घाटी में तीन पुलिसकर्मियों की आतंकियों द्वारा हत्या करने से भारत की ओर से तीखी प्रतिक्रिया दी गई है। संयुक्त राष्ट्र महासम्मेलन में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की प्रस्तावित वार्ता को भारत ने विराधस्वरूप ठुकरा दिया है। सीधा संदेश है पाकिस्तान से अब न बात न कोई मुलाकात।
इमरान से कोई आस बेमानी
पाकिस्तानी सेना की मेहरबानी से प्रधानमंत्री पद पर काबिज हुए पूर्व क्रिकेटर इमरान खान से शांति बहाली की आस बेमानी ही साबित होगी। इमरान खान के कट्टरवादी रवैये से कश्मीर मुद्दे पर बयान तो सुने जा सकते हैं, लेकिन ठोस पहल दूर की कौड़ी ही रहेगी।
Published on:
22 Sept 2018 01:50 am
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