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डूंगरपुर-बांसवाड़ा के आदिवासियों को वर्षों से है ट्रेन का इंतजार

रेल परियोजना नहीं बढ़ी आगे, बजट में भी नहीं मिला कुछ भी

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The tribals of Dungarpur-Banswara have been waiting for the train for years

Rail project did not progress further, nothing was found in the budget

बांसवाड़ा. प्रदेश के आदिवासी बहुल बांसवाड़ा जिले को रेल से जोडऩे की घोषणा महज झुनझुना ही साबित हुई है।
नौ वर्ष पहले २०११ में डूंगरपुर से रतलाम वाया बांसवाड़ा रेल परियोजना की घोषणा हुई, लेकिन वागड़ के लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ ही हुआ। बीते दो वर्षों से यह परियोजना ठप है। केंद्र व राज्य सरकार के साझे में बनने वाली यह देश की पहली परियोजना थी। आरंभिक कार्य के लिए राज्य सरकार ने २०० करोड़ रुपए दिए, लेकिन २०१३ में सत्ता परिवर्तन के बाद वागड़ के सपनों की रेल की चेन राज्य सरकार ने खींच ली। १७६ किमी लंबी यह परियोजना डूंगरपुर से आरंभ होगी और रतलाम तक पहुंचेगी। इसमें करीब ५० किमी हिस्सा मध्यप्रदेश में है।
लगातार बढ़ी लागत : २१०० करोड़ रुपए की परियोजना २०१५-१६ तक २५६० करोड़ रुपए तक पहुंच गई। देरी होने से यह प्रोजेक्ट ४५०० करोड़ से अधिक का हो गया है। डूंगरपुर में रेलवे लाइन के 0 से ७५ किमी तक का क्षेत्र हैं। इसमें डूंगरपुर सहित बांसवाड़ा की गढ़ी तहसील तक का हिस्सा है। यहां 0 से 17 किमी की ही जमीन रेलवे को मिली। बांसवाड़ा में ७५ से १४२.८५ किमी तक का गढ़ी से मध्यप्रदेश सीमा तक (६७ किमी) क्षेत्र है। इनमें से १०६ से १२३ किमी तक की तथा दो छोटे-छोटे ब्लॉक में छह से सात किमी तक की जमीन रेलवे को मिली।
एक वर्ष में यह हुआ

बीते वर्ष नीति आयोग की बैठक में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने डूंगरपुर-रतलाम वाया बांसवाड़ा का निर्माण कार्य शीघ्र शुरू करने की मांग उठाई थी, लेकिन यह कागजों में दफन हो गई। इसके कुछ समय बाद बांसवाड़ा सांसद कनकमल कटारा की ओर से लोकसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में रेल मंत्री ने कहा था कि तत्कालीन प्रदेश सरकार की ओर से भूमि और अपने हिस्से की राशि नहीं दिए जाने के कारण परियोजना को स्थगित कर दिया है। पिछली राज्य सरकार ने न अपेक्षित भूमि उपलब्ध कराई और न अपनी शेयर राशि जमा कराई। अब फिर राज्य के सांसदों के साथ लोकसभा अध्यक्ष की बैठक में बांसवाड़ा को रेल से जोडऩे का मुद्दा उठाया गया।
बंद हो गए कार्यालय
गत राज्य सरकार की बेरूखी के कारण उत्तर-पश्चिम रेलवे ने सरकार की ओर से जमीनों के मुआवजे का बजट जारी नहीं करने के कारण जिलों में उप मुख्य अभियंता (निर्माण) कार्यालय बंद कर दिए। केंद्र ने दो बजट तक राशि जारी की, जिससे अर्थ वर्क व ब्रिज वर्क चले, लेकिन जमीन अधिग्रहण और मुआवजा राशि जारी करने का जिम्मा राज्य सरकार पर था। सरकार बदलने से दोनों कार्य अटक गए। रेलवे ने भी 75 त्न जमीन मिलने से पूर्व काम शुरू नहीं करने का फरमान जारी कर दिया। वित्तीय वर्ष २०२०-२१ के बजट में रेलवे की पिंक बुक में इस परियोजना पर अब तक हुए व्यय की जानकारी देकर कर्तव्य की इतिश्री कर ली गई है।
पत्रिका ने चलाया था अभियान
आजादी के बाद से रेल का सपना देख रहे बांसवाड़ा वासियों के लिए वर्ष 2006-07 में पत्रिका ने 'रन फॉर रेलÓ मुहिम छेड़ी। रेल की जरूरत के मुद्दे को उठाते हुए 'रन फॉर रेलÓ के माध्यम से आमजन को जोड़ा गया और जनता और सरकार के बीच सेतु बनकर पत्रिका ने आवाज पहुंचाई थी। पोस्टकार्ड अभियान सहित श्रृंखलाबद्ध समाचारों से जनप्रतिनिधियों पर दबाव बना और बांसवाड़ा में रेलवे परियोजना को प्राथमिकता में सम्मिलित किया गया।
१८४.२१ करोड़ खर्च
परियोजना पर मार्च २०१९ तक १८४.२१ करोड़ व्यय किए जा चुके थे। इनमें डूंगरपुर जिला मुख्यालय, बांसवाड़ा मे गणाऊ, झूपेल क्षेत्र में कुछ अर्थवर्क कार्य हुए। परियोजना के लिए १७३६ हैक्टेयर भूमि की जरूरत थी, जिसमें से मात्र ६४६ हैक्टे. भूमि ही सौंपी गई। अवाप्त भूमि के बदले भूमि मालिकों को मुआवजे के रूप में राजस्थान सरकार की ओर से ६२.७१ करोड़ रुपए का भुगतान किया गया है।