15 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

नई कहानियों संग पुराने दौर को लेकर आगे बढ़ेगा थिएटर

कला - एक्टर और लेखक पीयूष मिश्रा बता रहे हैं नए साल में थिएटर का भविष्य

2 min read
Google source verification

जयपुर

image

Neeru Yadav

Jan 04, 2021

नई कहानियों संग पुराने दौर को लेकर आगे बढ़ेगा थिएटर

नई कहानियों संग पुराने दौर को लेकर आगे बढ़ेगा थिएटर

बदलाव हर दौर में होते रहे हैं। विश्व युद्ध हुआ था तो साहित्य से लेकर कला जगत तक इसका असर देखने को मिला। कोविड-19 भी एक महात्रासदी है। इसमें एक लंबा डिप्रेशन का दौर रहा है। आने वाले समय में फिल्मों से लेकर साहित्य तक में इसका भी असर दिखाई देगा। आज के युवा ने अली गाजी, बव कारंत, हबीब तनवीर, बंशी कौल को नहीं देखा। आज की पीढ़ी के पास सिर्फ इंटरनेट ही है। इंटरनेट से कितना नया गढ़ा जाता सकता है? आज युवा भी कुछ नया करने के लिए तड़प रहे हैं।

अब लिखा जाएगा तीसरी तरह का साहित्य :साहित्य की बात करें तो पहले माखनलाल चतुर्वेदी और मुंशी प्रेमचंद का दौर था। इस पर समाजवाद का असर रहा। फिर फेमिनिज्म पर लिखा जाने लगा, औरत के नजरिए से लिखा गया। अब तीसरे तरह के साहित्य को रचे जाने की जरूरत है। अब डिप्रेशन और मानव मूल्यों से जुड़ा साहित्य गढ़ा जाएगा।

हिंदी में अच्छे नाटकों का अभाव : हिंदी रंगमंच की स्थिति की बात करें तो अन्य भाषाओं की तुलना में हिंदी भाषा में नए नाटक नहीं लिखे जा रहे हैं। कुछ पुराने नाटक हैं, जिन्हें बार-बार अलग अंदाज में परोसा जा रहा है, लेकिन आखिर इन्हीं को ही कब तक दिखाया जाता रहेगा? मुझे ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि हम नाट्य लेखन विधा में प्रवीण नहीं हो पाए हैं। हिंदी में आज अच्छे नाटकों का भारी अभाव है। विदेशों में शेक्सपियर के जमाने से ही अच्छे नाटक लिखे जा रहे हैं। हमारे देश में नाट्य लेखक कम पैदा हुए हैं, जिससे हम अनुवाद के सहारे जिंदा हैं।

थिएटर का उन्माद आज भी बरकरार : थिएटर का उन्माद कभी कम नहीं हुआ। सिनेमा से लेकर टीवी तक और अब ओटीटी जैसे दौर आए, लेकिन कभी थिएटर मरा नहीं। यह आर्टिस्ट का जोश है, जो इसे मरने नहीं देता। मैं खुद भी यह सोचकर चौंक जाता हूं कि आखिर पैसा कम होने के बाद भी लोग थिएटर करना क्यों चाहते? हमारे देश में नाट्य शास्त्र रचा गया, संस्कृत, ग्रीक, यूनानी और पारसी थिएटर से लेकर न जाने कितनी विधाएं जुड़ती गईं। हालांकि ये लाइव आर्ट है इसलिए कभी मर नहीं सकती। जब व्यक्ति डिप्रेशन में होता है तो इंटरनेट, टीवी-सिनेमा देखकर भी बोर हो जाता है। तब ये लाइव परफॉर्मेंस ही उसमें एक अलग जोश भरती है।

हमें रिवोल्यूशनरी होना होगा :मेरा मानना है कि टीवी-फिल्म की तरह एक थिएटर इंडस्ट्री भी होना चाहिए। जब बड़े प्रोड्यूसर पैसा लगाएंगे तो थिएटर भी विकसित होगा। कोरोना संक्रमण के चलते सिनेमा और थिएटर बंद हैं। फिल्में ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज हो रही हैं, लेकिन वैक्सीन आते ही पहले जैसा माहौल हो जाएगा और लोग फिल्म-नाटक देखने पहले जैसे ही जाने लगेंगे। अल गाजी साहब का नजरिया कुछ पाश्चात्य था, उनकी तरह रिवोल्यूशनरी होना होगा। दिल्ली जैसे शहरों को छोड़कर थिएटर में टिकट परंपरा अब तक हिन्दी भाषी प्रांतों में विकसित नहीं हो पाई है जबकि अमरीका-यूरोप में लोग अच्छा पैसा देकर खुशी-खुशी ड्रामा देखते हैं। अगले दशक में मैं उम्मीद करता हूं कि थिएटर नई कहानियों के संग पुराने दौर को लेकर आगे बढ़ेगा।(जैसा कि पीयूष मिश्रा ने हितेश शर्मा को बताया)