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JLF 2026: जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में इतिहास, स्थापत्य और सत्ता के सांस्कृतिक आयामों पर चर्चा

Jaipur Literature Festival: जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में 'ईरान टू इंडिया' सत्र में इतिहासकारों और विशेषज्ञों ने ईरान, अफगानिस्तान और भारत के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और स्थापत्य संबंधों पर चर्चा की।

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जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल। फोटो- पत्रिका

जयपुर। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आयोजित 'ईरान टू इंडिया' सत्र में इतिहास, स्थापत्य और सत्ता के सांस्कृतिक आयामों पर गहन चर्चा हुई। इस सत्र में प्रख्यात इतिहासकार और वास्तुकला विशेषज्ञ अलका पटेल और लेखक सैम डेलरिम्पल वक्ता के रूप में शामिल रहे। चर्चा का केंद्र बारहवीं शताब्दी के उस दौर पर रहा, जब आज के ईरान, अफगानिस्तान और भारत के बीच सांस्कृतिक, राजनीतिक और स्थापत्य स्तर पर गहरे संबंध बन रहे थे।

'भारत और ईरान के बीच का संबंध एकतरफा नहीं'

चर्चा मूल रूप से इस आधार यह रहा कि भारत और ईरान के बीच का संबंध एकतरफा नहीं था। यह एक पारस्परिक प्रक्रिया थी, जिसमें स्थापत्य, विचार और सत्ता की अवधारणाएं दोनों दिशाओं में प्रवाहित हुईं। यही साझा विरासत आज भी दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के इतिहास को समझने की कुंजी है।

अलका पटेल ने अपने शोध के आधार पर स्पष्ट किया कि उस समय ईरान और भारत को आज की तरह सीमाबद्ध राष्ट्र-राज्यों के रूप में देखना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है। आधुनिक अफगानिस्तान का क्षेत्र इन दोनों के बीच एक सेतु की तरह था, जहां सबसे रोचक सांस्कृतिक और स्थापत्य संवाद देखने को मिलता है।

घूरी वंश की उत्पत्ति और विस्तार पर भी चर्चा

पटेल ने बताया कि उनका शोध दो खंडों में है। पहला खंड ईरानी सांस्कृतिक परंपराओं और घूरी वंश के उदय पर केंद्रित है, जबकि दूसरा खंड भारत में इनके प्रभाव और यहां हुए स्थापत्य विकास को समझने का प्रयास करेगा। उन्होंने कहा कि भारत में दिखाई देने वाले कई प्रारंभिक इस्लामी स्थापत्य रूप अचानक नहीं आए, बल्कि उनके पीछे ईरान और अफगानिस्तान में विकसित परंपराओं की लंबी पृष्ठभूमि थी।

सत्र में घूरी वंश की उत्पत्ति और विस्तार पर भी विस्तार से चर्चा हुई। अलका पटेल ने बताया कि घूरी मूल रूप से मध्य अफगानिस्तान के घूर क्षेत्र से आए थे और उनका जीवन घुमंतू और स्थायी समाज के बीच एक निरंतरता में था। यही गतिशीलता आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। इस सांस्कृतिक पूंजी ने उन्हें विशाल भौगोलिक क्षेत्रों पर शासन करने में सक्षम बनाया।

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उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि घूरी शासकों ने सत्ता स्थापित करने के लिए केवल सैन्य बल पर निर्भर नहीं किया, बल्कि इस्लामी पहचान, सांस्कृतिक संरक्षण और स्थापत्य निर्माण को सत्ता के औजार के रूप में इस्तेमाल किया सैम डेलरिम्पल ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भारतीय इतिहास में मुगलों को अक्सर एक अचानक उभरी शक्ति के रूप में देखा जाता है, जबकि वास्तव में उनके पहले की सदियों में घूरी और अन्य शासकों की तैयार की गई राजनीतिक और सांस्कृतिक जमीन ने ही मुगल साम्राज्य का मार्ग प्रशस्त किया।

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