जीरा एक बार फिर किसानों के जीव का बैरी बन गया है। बादलों की फांस में एक बार फिर जीरे की जान उलझ कर रह गई है। मौसम में हुए बदलाव से बढ़ी नमी और आकाश में छाए बादलों से जीरे की फसल पर खतरा मंडराने लगा है। एक महीने से अधिक की आयु पार कर चुके जीरे पर झुलसा रोग का खतरा बढ़ गया है। इससे जिले के किसानों के चेहरे पर चिंता की लकीरे खिंचने लगी है। गौरतलब है कि जोधपुर और जैसलमेर जिले के किसान पहले ही अरंडी और सरसों की फसल नुकसान झेल चुके हैं। अब बादलों ने जीरे की फसल को एक बार फिर संकट में डाल दिया है। अपनी लहलहाती फसल को देख दमक रहे किसानों के चेहरों से खुशी काफूर हो गई है और वह फसल को बचाने के उपायों को करने में जुटे हैं।
कम हो जाएगी मार्केट वैल्यू
ऐसे में कृषि विज्ञान केन्द्र, फलोदी के वैज्ञानिकों ने भी जीरे में झुलसा रोग लगने की आंशका जता दी है तथा इस रोग पर नियंत्रण को लेकर उपाय भी बताए हैं। उनका कहना है कि इसके प्रकोप से हालांकि उत्पादन में तो कमी नहीं आएगी, लेकिन दाना काला पड़ जाने से इसकी गुणवत्ता में कमी आने से फसल की मार्केट वैल्यू कम हो जाएगी।
झुलसा रोग के लक्षण
कृषि विज्ञान केन्द्र, फलोदी के मुख्य वैज्ञानिक अध्यक्ष व मुख्य वैज्ञानिक डॉक्टर महेन्द्रसिंह चांदावत ने बताया कि जीरे की फसल में फूल आने शुरू होने के बाद आकाश में बादल छाए रहे तो झुलसा या ब्लाइट रोग की आशंकाएं बढ़ जाती है।
किसानों को जीरे की फसल को बचाने के लिए सावधानी बरतनी होगी। फसल को खराबे से बचाने के लिए किसानों को समय.समय पर जीरे की पौधों पर दवाइयों का छिड़काव करना होगा। आकाश में बादलों छाने से जीरे में झुलसा रोग हो सकता है, इससे जीरा काला पड़ कर खारा हो जाता है। किसानों को इसे सहेजने के लिए पूरी सावधानी बरतनी होगी। उनकी ओर से फसल को सहेजने में बरती गई थोड़ी सी लापरवाही बड़ा नुकसान करा सकती है। इस रोग में पौधों की पत्तियों और तनों पर गहरे भूरे बैंगनी रंग के धब्बे पड़ जाते हैं तथा पौधों के शीर्ष भाग जमीन की तरफ झुकने लगते हैं। जीरे में यह रोग अत्यधिक तेजी से फैलता है तथा लक्षण दिखाई देते ही प्रबंधन के उपाय करने आवश्यक हो जाते हैं। अगर रोग पर नियंत्रण न हो तो फसल में भारी नुकसान की संभावना रहती है।
सिंचाई नहीं करने की सलाह
कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक जीरे केा जरूरी उपचार देकर झुलसा रोग से बचाया जा सकता है। रोकथाम के लिए फसल में लक्षण एवं कीटों का प्रकोप देखकर उपाय किए जा सकते है। आकाश में बादल दिखते ही जीरे पर खतरा मंडराने लगता है। बादल दिखते ही जीरे के बचाव के उपाय शुरू कर देने चाहिए।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि मौसम में अभी भी थोड़ी नमी घुली है। ऐसे में किसान जीरे की फसल में सिंचाई नहीं करें। मौसम में नमी होने से फसल में झुलसा रोग का प्रकोप बढ़ जाता है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक जीरे में झुलसा रोग के प्रबंधन के लिए बुवाई के 30 से 35 दिन बाद फसल पर दो ग्राम मेन्कोजेब 80 डब्ल्यू पी अथवा हेक्साफोनाजोल 4 प्रतिशत और जाइनेब 68 प्रतिशत के बने हुए मिश्रण को प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। साथ ही, जीरे में खड़ी फसल उखटा रोग या विल्ट से प्रभावित होने पर पौधे मुरझा जाते हैं। इसके प्रबंधन के लिए 2.5 किलो ट्राइकोडर्मा विरिडी मित्र फफूंद प्रति सौ किलो सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर खेत में भुरकाव करके हल्की सिंचाई करनी चाहिए।
आकाशमें बादल छाने से वातावरण में नमी बढ़ जाएगी और इससे कीट का प्रकोप बढ़ सकता है। किसानों को फसलों को कीटों के प्रकोप से बचाने के लिए नियमित खेत की रखवाली करनी होगी। वातावरण में बढ़ी नमी से सभी फसलों के लिए नुकसानदायक है। जीरे में फसल आना शुरू होते ही झुलसा रोग से बचाव शुरू करने की जरूरत है। इसके लिए डायथेन एम 45 का 2.3 ग्राम एक लीटर पानी की दर से 10 से 15 दिन या आकाश में बादल रहने तक छिड़काव दोहराएं।