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पिता के अटूट हौसलों की उड़ान हैं ये बेटियां

जयपुर. आज वर्ल्ड फादर्स डे है। जून के तीसरे रविवार को मनाए जाने वाले इस दिन का उद्देश्य पिता के निस्वार्थ प्रेम और त्याग को स्मान देना है। एक पिता खामोशी के साथ अपने परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए दिन-रात मेहनत करता है, लेकिन बदले में अपने लिए कुछ नहीं मांगता। अपने बच्चों के सपनों को ऊंची से ऊंची उड़ाने देने के लिए वह खुद को भी भूल जाता है।अपनी बेटियों के सपने पूरे करने में उनके पिताओं ने कोई भेदभाव नहीं किया।

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जयपुर

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Mohmad Imran

Jun 18, 2023

पिता के अटूट हौसलों की उड़ान हैं ये बेटियां

पिता के अटूट हौसलों की उड़ान हैं ये बेटियां

परिवार की पहली एथलीट बनीं पापा की लाडली
जर्मनी के हैमबर्ग में आयरनमैन प्रतियोगिता पूरी कर देश का नाम रोशन करने वाली शिवांगी अपने संयुक्त परिवार की पहली एथलीट हैं। विमल सारडा ने अपनी दोनों बेटियों को उनके हर निर्णय में सपोर्ट किया है। छह साल की उम्र से शिवांगी को स्पोट्र्स में हिस्सा दिलाने के लिए विमल एक शहर से दूसरे शहर जाते थे। कई बार ट्रकों में बैठकर सफर किया। हमेशा बेटी के साथ मजबूती से खड़े रहे। दोनों एक-दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त हैं।

पिता और ससुर के हौसले से जीता
शहर की थिएटर आर्टिस्ट और थिएटर थेरेपिस्ट डॉ. आरती अतुल माहेश्वरी (खटोड़) को हाल ही मुंबई में आयोजित हुए दादा साहेब फाल्के इंडियन टेलीविजन अवॉर्ड-2023 में उनके रंगमंच के क्षेत्र में किए कार्यों के लिए सम्मानित किया गया है। पेशे से रंगकर्मी, अभिनेत्री, शिक्षक, स्क्रिप्ट राइटर, डायरेक्टर आरती बीते 28 वर्षों से नाट्य कला जगत में काम कर रही हैं। वह नाटकों और थिएटर परफॉर्मेंस के जरिए झुग्गी झोपडिय़ों के बच्चों को अपने अनकहे जज्बात कहने का अवसर नाटक के जरिए देती हैं। अवॉर्ड शो में फैशन, फिल्म, टेलीविजन और थियेटर से 60 पार्टिसिपंट्स में से थिएटर कैटेगरी में आरती का चयन किया गया। आरती ने बताया कि उनके पिता गोविंद कोठारी ने उन्हें थियेटर में आने पर बहुत सपोर्ट किया। 1999 में उनकी कम्युनिटी में थिएटर के लिए लड़कियों को बहुत सपोर्ट नहीं किया जाता था। लेकिन उस दौर में भी उनके पिता ने उन्हें थिएटर करने में पूरा सपोर्ट किया। शादी के बाद उनके ससुर ने उनकी इस प्रैक्टिस को रोका नहीं बल्कि पीएचडी करने और थियेटर से जुड़े रहने को कहा। आरती का कहना है कि आज अगर वह थियेटर में अपनी पहचान बना सकी हैं, तो अपने पिता और ससुर के सपोर्ट से बना सकी हैं।

पापा ने कभी महसूस नहीं होने दिया कि बेटियां, बेटों से कम सक्षम हैं
अगस्त में देश और राजस्थान को कजाकिस्तान में रिप्रेजेंट करने जा रहीं बनस्थली विद्यापीठ की एनसीसी कैडेट कार्पोरल वेन्या गंगवानी का कहना है कि उनके पिता ने उन्हें हमेशा यह महसूस करवाया कि बेटियां भी बेटों जितना ही सक्षम होती हैं। जब मैंने 10वीं में पहली बार एनसीसी ज्वॉइन की, तो मेरे फादर को बहुत गर्व हुआ। उन्होंने आज भी मेरी एनसीसी ड्रेस में पहली फोटो अपने पास संभालकर रखी हुई है। वह सोशल मीडिया पर मेरे अचीवमेंट्स और फोटो शेयर कर हमेशा अपना गर्व बताकर मुझे हिम्मत देते रहते हैं। उन्होंने कभी अपनी इच्छाएं मुझपर नहीं थोपीं। आरडी परेड के लिए बेस्ट कैडेट बनने के मेरे लक्ष्य को पूरा करने के दौरान भी पापा ने बहुत सपोर्ट किया। कई बार जब मैं हिम्मत हार जाती, तो भी वह मुझे हिम्मत बंधाते थे। कैंप में मेरे लिए खाना लेकर आते थे। आज मेरे भाई को भी घर में मेरी मिसाल दी जाती है।


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