
दीयों की बिक्री में इस बार रिकॉर्ड तोड़ बिक्री
जयपुर.चाइनीज आइटम से बढ़ती दूरी का असर हर एक पर्व पर देखने को मिल रहा है। ईको-फ्रेंडली और स्वदेशी जैसी मुहिमों के बीच एक बार फिर से मिट्टी के दीये शहरवासियों की पहली पसंद बन गए हैं। लेकिन इस बार इसका सबसे ज्यादा असर दिवाली पर होने वाली सजावट में भी देखने को मिलेगा। ग्राहक चाइनीज झालरों से दूरी बना रहा है। अब परम्परागत दीयों का कारोबार बढऩे लगा है। बीते सालों की तुलना में इस बार 40 फीसदी तक बढ़ोतरी की उम्मीद कर रहे हैं। ज्यादा मांग के साथ कुंभकारों ने दीयों के स्वरूप में भी बदलाव कर दिया है। ग्राहक दिवाली पर रोशनी के लिए चाइनीज झालरों की जगह मिट्टी के दीपक से घरों में रोशनी को प्राथमिकता दे रहे हैं। शहर में पोकरण सहित अन्य जगहों से आए कुंभकारों की मानें तो बीते कई सालों से मंद पड़े दीया कारोबार को इस बार संजीवनी मिल गई है। मिट्टी के लक्ष्मी और गणेश भी चलन में हैं। बाजार में पांच रुपए से लेकर 500 रुपए तक के दीये मौजूद हैं। सबसे ज्यादा पंचमुखी, श्रीफल, त्रिमुखी, सातिया रंग बिरंगे दीयों की मांग है। वहीं स्टील, चांदी के मोम के दिए भी बाजारों में ग्राहकों को लुभा रहे है। अब तक की बिक्री से कुम्हारों के चेहरों पर खुशी है।
तकनीक का इस्तेमाल
कारीगरों की मानें तो दीयों के पारम्परिक स्वरूप से स्टाइलिश लुक ग्राहकों को ज्यादा पसंद आ रहा है। आकर्षक डिजायन की वजह से युवाओं का रुझान इस ओर बढ़ रहा है। दिवाली तक जयपुर जिले में दो करोड़ रुपए से ज्यादा दीयों का कारोबार होने का अनुमान जताया जा रहा है। खपत ज्यादा और समय कम होने के कारण कारीगरों ने भी परम्परागत तरीके छोडक़र जुगाड़ के इलेक्ट्रिक चाकों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। इनसे एक घंटे में 400 के आसपास दीए तैयार किए जा रहे हैं।
मांग में तेजी
आमेर व जयसिंहपुरा खोर में कारीगरों ने बताया कि मिट्टी के दीए फिर से मांग में हैं। दिवाली पर केवल जलाने के लिए ही नहीं घरों में सजावट के लिए भी लोग दीये खरीद रहे हैं। लुहारों का खुर्रा, पुरानी बस्ती, मेहरों की नदी सहित अन्य जगहों पर बनाए जा रहे हैं।
Published on:
24 Oct 2019 07:12 pm
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