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टोंक का नमदा: विदेशों में भी धाक जमा रहा ‘बारीक सुई की कलाकारी का कमाल’

कोरोना काल के दौरान व्यवसाय में गिरावट जरूर आई थी। अब फिर से नमदा कारोबार में बूम आ रहा है।

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जयपुर

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Amit Purohit

Feb 01, 2023

Tonk Namda

नमदा बनाते कारीगर

टोंक. पत्रिका न्यूज नेटवर्क. राजस्थान में स्थानीय स्तर पर लोक प्रिय रहा टोंक का नमदा विदेशों में धाक जमा रहा है। दिनों-दिन टोंक के नमदे की मांग बढ़ रही है। व्यवसाय से जुड़े लोगों की माने तो सालाना कारोबार बढ़कर 25 करोड़ तक पहुंच गया है।

हालांकि कोरोना काल के दौरान व्यवसाय में गिरावट जरूर आई थी। अब फिर से कारोबार में बूम आ रहा है। शहर में इस व्यवसाय से करीब 4 हजार परिवार लोग जुड़े हुए हैं। पुरानी टोंक क्षेत्र के अधिकतर घरों में नमदे की कारीगरी करते हुए लोगों को देखा जा सकता है।

नमदे पर कलाकारी का काम बारीक सुई से किया जाता है। इसे बार-बार उत्पाद पर इस तरह से चुबाया जाता है कि उसमें मनचाहा आकार दे दिया जाता है। इसमें महिलाएं खासी एक्सपर्ट होती है। अब युवाओं का भी इस व्यवसाय की ओर से रुझान होने लगा है। बड़ी तादाद में युवा इस व्यवसाय से जुड़ रहा है।

कई प्रकार के बनते हैं सामान:
भेड़ की ऊन से बनाए जाना वाले नमदे से कई प्रकार के सामान बनाए जाते हैं। इसकी सर्वाधिक मांग दिसम्बर में आने वाले क्रिसमस डे पर होती है। इसकी तैयारियां अभी से ही शुरू कर दी गई है। जुलाई-अगस्त तक माल की आपूर्ति करने के लिए अभी से ही कारीगर जुट गए हैं। वहीं सर्दी के दिनों में पहनने वाले जूते व चप्पल अधिकतर स्थानीय स्तर पर ही बिकते हैं। जबकि खिलौने आदि विदेशों में जाते हैं।

यूं होती है कि सरकार से मदद:
इस व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से भी योजना चलाई जा रही है। इसके तहत नमदा व्यवसायियों को जहां ऋण दिया जाता है। वहीं अपने उत्पाद को बेचने के लिए सरकारी मेलों में भेजा जाता है। ताकि वे अपने उत्पाद की प्रदर्शनी लगाकर बेच सके। इसके लिए उन्हें किराया और स्ट्रॉल लगाने में छूट दी जाती है। यह मेले दिल्ली समेत देशभर में लगाए जाते हैं।

टोंक में नमदे का इतिहास:
कई शोधकर्ता नमदा का अविष्कार चंगेज खां के समय 1162 ई. से 1227 के बीच मानते हैं। कई का मानना है कि ये बहुत ही प्राचीन कला है। भारत में इसका प्रचलन मुगलकाल में हुआ बताया जाता है। टोंक में नमदा का कार्य प्रथम नवाब अमीर खां के समय ही होने लगा था। मुगलकाल में लाहौर, जयपुर, कश्मीर व आगरा आदि जगहों पर नमदे का उद्योग विकसित हुआ। लेकिन कई जगह ये कला लुप्त हो गई। जहां नमदा बनाना अपने आप में एक कला है। वहीं नमदा डिजाइनिंग में भी काफी संभावनाएं हैं। व्यवसाय से जुड़े शानू खान ने बताया कि नमदे का काम सदियों से चल रहा है। पहले भेड़ की ऊन से बनने वाले नमदे से आसन, बरसात से बचने के लिए घूगी तथा सर्दी में मवेशी को बचाने के लिए ढली बनती थी। धीरे-धीरे इसमें नवाचार होता गया।

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