
वैसे तो बंधेज का शाब्दिक अर्थ प्रतिबंध, रुकावट या नियत परम्परागत प्रथा के रूप में जाना जाता है, लेकिन फैशन की दुनिया में लोग इसे बांध कर रंगे कपड़े अथवा बांधनी कला की अनुपम कारीगरी के तौर पर भी स्वीकार करते हैं। गौरतलब है कि मुल्तान से मारवाड़ आई इस कला से जुड़े लोग जोधपुर, जयपुर और उदयपुर में इस कला के माध्यम से बरसों से आजीविका चला रहे हैं। सरकार को इस हस्तकला के जरिये प्रतिवर्ष सर्वाधिक विदेशी मुद्रा भी हासिल होती है। बंधेज कला की बात करें तो राजस्थान में जोधपुर का नाम सर्वोपरि है। जहां लहरिया, मोठड़ा, चूनर और पचरंगा विश्व विख्यात है। इसके बाद जयपुर में सांगानेरी ब्लॉक प्रिंट और उदयपुर का भोपालशाही लहरिया देश.दुनिया में प्रसिद्ध है।
तत्कालीन शासकों ने दिया बढ़ावा
लेकसिटी में रियासत काल से इस कला और कलाकारों को तत्कालीन शासकों ने इस कदर प्रश्रय दिया कि आज भी हस्तशिल्पी और रंगरेज अपने आश्रयदाता के नाम से ही भोपालशाही लहरिया के नाम से सृजित कर रहे हैं। हालांकि, आज के दौर में इस कला से जुड़े लोग और परिवार बहुत कम रह गए हैं। बावजूद इसके झीलों की इस नगरी में आठवीं जमात पढ़े सिद्धहस्त रंगरेज सिराजुद्दीन अपने साहबजादे मोहम्मद समीर और आमीर के साथ इस कला को जीवंत रखे हुए हैं। सिराज बताते हैं कि यह उनका पुश्तैनी काम है। उनके वालिद चांद मोहम्मद भी यही काम करते थे। उदयपुर की इस हस्तकला को यहां आने वाला हर सैलानी बड़े अदब से सराहता और खरीदता है। अधिकांश लोग प्योर जॉर्जेट, बंगलौर के सिल्क, शिफॉन और कॉटन पर बांधनी का काम चाहते हैं। वहीं, कुछ पर्यटक मेवाड़ी पाग और मोठड़े की मांग भी करते हैं। इसी तरह, मौसम और तीज.त्यौहार के हिसाब से भी लोग लहरिया, चूनर, पचरंगा आदि खरीदते हैं।
श्रम और संयम से पैदा होता है असर
सिराज बताते हैं कि कपड़े को मोडऩे, धागे से बंाधने और जरूरत मुताबिक हिस्से को कुशलता से रंगने की कला ही बांधनी कहलाती है। यह काम मूल रूप से चढ़ावा कलाकार करते रहे हैं। बंधेज में पांच रंग से तैयार साड़ी पचरंगी और साफा बावरा कहलाता है। केवल एक रंग का साफा जिसपर सफेद बंूदे हों, राजशाही कहलाता है। धारीदार बंधेज लहरिया और एक दूसरे को काटती धारियां मोठड़े की डिजाइन में प्रयुक्त होती हैं। इसी तरह, बंूदों के आकार में बनी आकृति चूनर और कोरे पल्ले की ओढऩी में बने कमल आकृतियां पोमचा के नाम से जानी जाती हैं। इन सभी तरह की बांधनी कला में श्रम और संयम से ही असर पैदा होता है।
कच्चे.पक्के रंगों से आता है निखार
बंधेज की तैयारी के तहत कपड़े को रस्सी में डाले बल की तरह मोड़कर लकड़ी पर लगाकर कच्चे सूत से बांधते हैं। उसके बाद पहले हल्के रंग चढ़ाकर बाद में गहरे रंगों से डाई की जाती है। इनके लिए जरूरत मुताबिक कलर्स का इस्तेमाल किया जाता है। एक साड़ी, पाग या मोठड़ा तैयार करने में तीन से पांच दिनों की मेहनत लगती है। आमतौर पर ग्राहक बंधेज की साडिय़ा,मोठड़ा, मेवाड़ी पाग, सलवार सूट, बेडशीट, चूनड़, कुर्ते, रुमाल आदि पसंद करते हैं।
नई पीढ़ी को भी बांट रहे कला ज्ञान सिराज पिछले बीस पच्चीस वर्षों से इस कला की बारीकियां नई पीढ़ी को भी बांट रहे हैं। पूरे साल वे अंबावगढ़ स्थित सांस्कृतिक स्त्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र से जुड़े रहकर संभागभर के सरकारी स्कूल.कॉलेज में इस कला को सिखाते हैं। उनके परिवार के अलावा उनका ससुराल पक्ष भी इस कला को जीवित रखने और बढ़ाने के प्रति समर्पित भाव से लगा हुआ है, जिनमें परिवार और समाज की महिलाएं और बच्चियां भी शामिल हैं।
Published on:
27 Dec 2019 05:52 pm
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