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silicone stent: श्वास नली में सिलिकोन स्टैंट डाल हटाई ट्रेकीयो स्टोमी ट्यूब

silicone stent: जयपुर हाल ही में डॉक्टरों ने एक मरीज की सांस की नली में सिलिकोन स्टैंट डाल ट्रेकीयोस्टोमी ट्यूब हटाने में कामयाबी हासिल की है

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जयपुर

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Tasneem Khan

Oct 09, 2021

Tracheo stomy tube removed by inserting a silicone stent in the windpipe

Tracheo stomy tube removed by inserting a silicone stent in the windpipe

silicone stent: जयपुर हाल ही में डॉक्टरों ने एक मरीज की सांस की नली में सिलिकोन स्टैंट डाल ट्रेकीयोस्टोमी ट्यूब हटाने में कामयाबी हासिल की है। सिलिकोन स्टैंट को सांस नली में लगाने का यह प्रदेश का पहला मामला बताया जा रहा है।महेश (परिवर्तित नाम) करीब दो साल पहले न्यूमोनिया के कारण रूकमणि बिड़ला अस्पताल के आईसीयू में भर्ती हुआ। लंबे समय वेंटिलेटर पर रहने से ट्रेकीयोस्टोमी करनी पड़ी। चेस्ट स्पेशलिस्ट एंड इंटरनेशनल पलमोनोलोजिस्ट डॉ. राकेश गोदारा ने बताया कि ट्रेकीयोस्टोमी ट्यूब निकालते समय पता चला कि ट्रेकीयोस्टोमी के ऊपर वाला सांस मार्ग सिकुड़ गया है और मरीज कुछ पल के लिए भी सांस नहीं ले पा रहा है। ऐसे में ट्रेकीयोस्टोमी ट्यूब भी नहीं निकली जा सकती। मेडिकल में इसे पोस्ट इंट्यूबेशन ट्रेकीयल स्टीनोसिस (पीआईटीएस) कहते हैं। इसमें पहले मोंटगोमेरी टी-ट्यूब डालकर ऊपर का रास्ता खोला। अब मरीज को जिंदगीभर ट्रेकीयोस्टोमी ट्यूब के साथ रहना था, इसमें इसकी देखभाल भी काफी रहती है, मरीज बोल नहीं पाता। बार-बार इसके ब्लॉक होने एवं फेफड़ों में संक्रमण का खतरा भी रहता है।सामान्यतया श्वांस नली में अवरोध, सिकुडऩ एडवांस कैंसर में गांठ से होता है, ऐसी स्थिति में मरीज को मेटल का स्टैंट डाला जाता है, जो कि तुरंत रास्ता खोल मरीज को आराम प्रदान कर देता है। लेकिन यह बाद में निकाला नहीं जा सकता। ऐसे में मरीज को श्वांस नली के ऊपरी भाग (सब ग्लोटिक) में सिलिकोन स्टैंट डालने का विकल्प बताया। ताकी9 से 12 महीने में स्टैंट वापस निकलकर देखा जा सकता है कि अवरोध परमानेंट खुल गया है या नहीं। ऊपरी भाग में स्टैंट को स्थिर करने के लिए एक विशेष तकनीक से स्टैंट को श्वांस नली के साथ टांके से भी जोड़ा गया। ये प्रोसिजर रिजिड ब्रोंको स्कोपी के माध्यम से स्पेशल स्टैंट लोडर डिवाइस एंड तकनीक से इंटरवेंशनल पलमोनोलोजिस्ट के जरिए किया जाता है। इस प्रोसिजर में डॉ. राकेश के साथ डॉ. अतुल पुरोहित (निश्चेतन विभाग), रईस कुरैशी (ब्रोंकोस्कोपी टेक्निशियन) व टीम का सहयोग रहा।