
फाइल फोटो
भीषण गर्मी के साथ अब पानी में भी आग लगने लगी है। घरों में नलों ने टपकना बंद कर दिया। सूरज की त्योरियां चढ़ते ही तालाब-बावडिय़ां भी जवाब देने लगी हैं। कुएं पैंदे में बैठते जा रहे हैं। उनसे अब और उम्मीद करना बेइमानी है। एक-एक बाल्टी के लिए मशक्कत। बूंद-बूंद के लिए संघर्ष। कहीं पानी का इंतजार तो कहीं अमृत के लिए तकरार। कहीं रातें बीत रहीं तो कहीं दिन से आस बंध रही। जो बचा है उस पर पहरे हजार, जो मिल जाता तो उस पर टूटते अपार। प्रदेश में पानी को लेकर कुछ इस तरह का ही हाल है। आए दिन अखबारों में ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं जो शर्म से पानी-पानी कर रही हैं। आजादी के 75 साल बाद भी ऐसी तकलीफ। एक ओर आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ बूंद-बूंद के लिए बड़ी आबादी जूझ रही है।
रोज देनी पड़ती परीक्षा
बाड़मेर के रामसर, गडरा रोड क्षेत्र के सरगीला, बन्ने का पार, चांद का पार, सजन का पार जैसे कई गांवों में आज भी नर्मदा नहर और इंदिरा गांधी नहर का इंतजार है। पेयजल परियोजनाओं ने तो रेतीले धोरों में दम तोड़ दिया लेकिन पानी की पुरानी बेरियां ही यहां पर जीने का अंतिम आसरा है। हालात ऐसे हैं कि एक घड़े पानी के लिए भी महिलाओं और बालिकाओं को मीलों दूर तक तपते रेगिस्तान के समंदर को पार करना पड़ता है। उधर, पुरुष भरी दोपहरी उस पानी पर पहरा देते हैं। बांसवाड़ा के छोटी सरवा में तो पानी के लिए ग्रामीणों को रोज परीक्षा से गुजरना पड़ता है। कुशलगढ़ उपखंड के एकपुरा गांव में तो कुएं के दलदल में से पानी चुराया जा रहा है। पाली के जवाई बांध में पानी रसातल में पहुंचने से जलसंकट के हालात बन गए हैं। गांवों में एक मटका पानी के लिए महिलाओं को कुओं-बोरियों में जान जोखिम में डालनी पड़ रही है। कोटा शहर के कुछेक इलाकों में तीन-चार दिन में केवल आधे घंटे के लिए जलापूर्ति होती है। ऐसे में स्थानीय लोगों को गड्ढा खोद पंप से पानी खींचना पड़ता है।
राजधानी में सिर फुटव्वल जैसे हालात
राजधानी जयपुर में भी हालात इससे अलग नहीं। झालाना बायपास पर तो पानी के लिए जैसे हाहाकार मचा है। यहां पेयजयल के लिए तीन टंकियां रखी हुई हैं। पहले इनको टैंकर से दिन में तीन बार भरा जाता था। लेकिन गर्मी के इस दौर में सुबह केवल एक बार भरा जा रहा है। यही स्थिति कुंडा बस्ती की है। यहां पानी के लिए अलसुबह ही मारपीट की नौबत आ जाती है। इतना कुछ होने पर भी जलदाय विभाग आंखों पर पट्टी बांधकर बैठा है। शहर में भी जो आपूर्ति हो रही है वह नाकाफी साबित हो रही है।
अब तो जतन करो
पानी के लिए त्राहिमाम-त्राहिमाम मची है। लेकिन व्यवस्था में सुधार के लिए कोई जतन नहीं दिख रहे। लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। पानी सिर से गुजर चुका है। ऐसा न हो पानी को लेकर लोग खुद ही हालात से निपट ले। बेहतर होगा जलदाय विभाग इस मसले पर मानवीय दृष्टिकोण अपनाए। उपलब्ध साधन-संसाधनों का बेहतर उपयोग कर व्यवस्था में सुधार के लिए प्रयास करे। भविष्य के लिए पानी बचाने पर फोकस करे। भूजल लेवल बढ़ाने पर काम करे। क्योंकि बिन पानी सब सून।
Published on:
13 Apr 2022 12:55 pm
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