
हुब्बल्ली. श्रीमरुधर जैन संघ हुब्बल्ली के तत्वावधान में आयोजित चातुर्मास धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य दिव्येशचन्द्र सागरसूरि ने कहा कि पांच ज्ञानों में केवल श्रुतज्ञान का ही आदान-प्रदान संभव है। यही कारण है कि श्रुतज्ञान की पूजा और स्थापना की जाती है, क्योंकि यही आत्मकल्याण का प्रमुख साधन है।उन्होंने कहा कि तीर्थंकर परमात्मा की वाणी द्रव्यश्रुत कहलाती है और उसे श्रद्धापूर्वक सुनने से श्रुतज्ञानावरणीय कर्म का क्षयोपशम होता है, जिसे भावश्रुत कहा जाता है। प्रभु का संपूर्ण शासन श्रुतज्ञान और आगम शास्त्रों के आधार पर संचालित होता है। जैसे आंख मार्ग दिखाती है, वैसे ही शास्त्र साधु को मोक्षमार्ग का पथ प्रदर्शित करते हैं। आचार्य ने कहा कि आज अधिकांश लोग सम्यग्ज्ञान के वास्तविक स्वरूप से अनभिज्ञ हैं। सम्यग्ज्ञान आत्मा को आत्महित की ओर ले जाता है, जबकि मिथ्याज्ञान अशांति, असंतोष और अधोगति का कारण बनता है। जिसके हाथ में सम्यग्ज्ञान रूपी दीपक होता है, वह भवसंसार के अज्ञानरूपी अंधकार में कभी नहीं भटकता और साधना के मार्ग में निरंतर आगे बढ़ता है।
Updated on:
06 Aug 2026 06:01 am
Published on:
06 Aug 2026 06:01 am
