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अटपटे नामों से भरी पड़ी हैं इस शहर की गलियां, जानिये हर नाम के पीछे अजब कहानी..

कभी आपने सोचा है कि काला गोखड़ा का नाम कैसे पड़ा, आखिर फूटा दरवाजा क्या वाकई फूटा हुआ है , ऊंटों का कारखाने में ऊंट तो नजर ही नहीं आते... ऐसे अटपटे नाम में दिन में कई बार लेते हैं और बीसियों पर वहां जाना भी होता है लेकिन नाम के पीछे का रहस्य जानने की कोशिश नहीं की।

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कभी आपने सोचा है कि काला गोखड़ा का नाम कैसे पड़ा, आखिर फूटा दरवाजा क्या वाकई फूटा हुआ है , ऊंटों का कारखाने में ऊंट तो नजर ही नहीं आते... ऐसे अटपटे नाम में दिन में कई बार लेते हैं और बीसियों पर वहां जाना भी होता है लेकिन नाम के पीछे का रहस्य जानने की कोशिश नहीं की।

भले ही अब शहर स्मार्ट सिटी की सीढिय़ां चढ़कर आगे बढऩे वाला हो, लेकिन शहर में कई जगह ऐसी हैं जो अपने अटपटे और चटपटे नामों के लिए मशहूर हैं। पुराने जमाने में इनके बारे में अधिकतर लोगों को पता था कि इनके नामकरण के पीछे क्या कारण थे? लेकिन, नई पीढ़ी इनसे अनजान हैं। चूंकि ये नाम पहले से प्रचलन में हैं इसलिए जैसा बड़े बोलते थे, वे भी बोलने लगे।

ऊंटों का कारखाना- पहले जमाने में राजा-महाराजाओं के सामान ऊंटों पर आते थे। ये ऊंट इस स्थान पर ठहरा करते थे।

धनकुटों की गवाड़ी- राजा-महाराजा के महलों में जो अनाज आता था तो उसका इस स्थान पर कूटा जाता था। इसलिए इसे धनकुटों की गवाड़ी कहा जाने लगा।

अमल का कांटा- मेवाड़ राज्य में एक्साइज एंड कस्टम (दाण) विभाग का चेकनाका यहां पर था जहां सभी प्रकार के स्वापक (नार्कोटिक्स) औषधियों और आयातित सामान पर कर वसूलना और उनको तोलने का काम होता था। चूंकि मेवाड़ क्षेत्र के चित्तौड़, वल्लभनगर, निम्बाहेड़ा और प्रतापगढ़ क्षेत्र में अफीम अत्यधिक होती थी इसलिए उसके कर और तोल दोनों का काम इस स्थान पर ही होता था। इ सलिए इसे अमल का कांटा कहलाता था।

बद्दु भक्तण का दरवाजा- जगदीश मंदिर से आगे जाने पर लाल घाट की ओर जानेवाले रास्ते का प्रवेश द्वार है। इस दरवाजे से जुड़ी हवेली जो कभी मेवाड़ दरबार की नर्तकी रही बद्दु की है। इसलिए इसे बद्दु भक्तण का दरवाजा कहा जाने लगा। यह किसी नाचने-गाने वाली किसी महिला के लिए सबसे बड़ा सम्मान था।

सीताफल की गली- पूरे शहर में यह एकमात्र स्थान था जहां सीताफल के वृक्ष थे इसलिए इसे सीताफल की गली कहते थे।

काला गोखड़ा- काला गोखड़ा श्रीनाथजी की हवेली जानेवाले मार्ग पर स्थित है। यहां पर उदयपुर में पहला ब्लेक स्टोन से बना शानदार नक्काशी वाले गोखड़े हैं, इसलिए इसे काला गोखड़ा कहते हैं।

भड़भुजा घाटी- यहां पर भड़भुजे रहते थे। भड़भुजा एक ऐसा समाज है जो विभिन्न प्रकार के अन्न, तिलहन और दलहन को भाड़ में भूंझने का काम करते थे। भाड़ आज के जमाने के हिसाब से एक नॉन कम्बशन फर्नेस (उच्च ताप वाली भट्टी) होती है। इसमें मक्का, चावल, ज्वार, बाजरा, मूंगफली, तिल, चना, मंूग आदि को बिना तेल भूंझा जाता है।

फूटा दरवाजा- यह स्थान भामाशाह मार्ग पर स्थित है। अब यहां पर किसी प्रकार के दरवाजे का एहसास नहीं होता। किसी जमाने में यहां पर बिना किंवाड़ का दरवाजा था इसलिए इसे फूटा दरवाजा कहा जाता था।

झीणी रेत- किसी समय में इस स्थान से होकर पिछोले का जल निकास होता था, इस कारण से यहां पर बारीक रेत फैली हुई थी। इसलिए इ स स्थान को उदयपुर में स्थानीय भाषा में झीणी रेत कहा गया।

आड़ी सड़क- उदयपुर से देवाली जाने के रास्ते पर सभी सड़कें दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ती हैं लेकिन एक सड़क पश्चिम की ओर बढ़ती है। पश्चिम की ओर जानेवाली सड़क को आड़ी सड़क कहा गया। क्योंकि यह समानांतर के स्थान पर अन्य सड़कों को काटती हुई निकलती है।

ठोकर चौराहा- आयड़ पुलिया के पुराने स्वरूप को देखने पर पुलिया के बाद सीधी चढ़ाई दिखती है तो जिस स्थान पर चौराहा बन रहा है, वह स्थान अचानक से सामान्य ऊंचाई से ऊंचा हो जाता था। इस प्रकार की स्थिति को मेवाड़ी में ठोकर कहते हैं इसलिए इसे ठोकर चौराहा कहा गया।

रेती स्टेण्ड- उदयपुर शहर के विस्तार के साथ ही सेवाश्रम चौराहे के पास और सेंट्रल एरिया में आवरी माता वाले क्षेत्र में रेत के व्यापारियों के ट्रक खड़े रहते थे इसलिए इसे रेती स्टेण्ड कहा गया।

मल्ला तलाई- यह मूलत: पिछोला का हिस्सा है और यहां पर नाव बनाने वाले और नाव संचालन करने वाले मल्लाहों की बस्ती और नाव निर्माण का काम होता था। इसलिए इसे मल्ला तलाई कहा गया। ऐसी मान्यता भी है कि मेवाड़ के युवक यहां पर व्यायाम करने के लिए आते थे और मल्लखंभ जैसे खेल का यहां पर अभ्यास करते थे। इसलिए इसे मल्ला तलाई कहा गया।

मालदास स्ट्रीट- उदयपुर के नगर सेठ मालदास के नाम पर इस स्ट्रीट का नाम रखा गया। लम्बे समय से यह महिलाओं की आवश्यक वस्तुओं व कपड़ों का व्यापार केंद्र है।

मार्शल चौराहा- स्वतंत्रता सेनानी मास्टर छोगालाल ने यहां पर एक अखबार की शुरुआत की थी। मास्टर छोगालाल को लोग मार्शल कहा करते थे इसलिए इस स्थान का नाम मार्शल चौराहे कहा जाने लगा। यह स्थान सूरजपोल से मुखर्जी चौक आते वक्त झीणी रेत से आगे आकर है। जहां से एक रास्ता अमल का कांटा व दूसरा धानमण्डी, तीसरा मुखर्जी चौक की ओर जाता है।

सिंधी बाजार- सिंध से आए शरणार्थियों को काम करने के लिए बाजार मुहैया कराया गया था। चूंकि इस बाजार में सर्वाधिक संख्या शरणार्थियों की थी इसलिए इसे सिंधी बाजार कहा गया। लम्बे समय तक यह उदयपुर क्षेत्र का फैशन मार्केट बना रहा।

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