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Valentine Day- हल्की गुनगुनी धूप के साथ कई प्यार भरी कहानियां

फरवरी का महीना अपने साथ हल्की गुनगुनी धूप के साथ कई प्यार भरी कहानियां भी साथ लेकर आता है। यह दिन उन लोगों के लिए खास होता है जो एक दूसरे को अपने दिल की बात बताना चाहते हैं इसलिए इसे प्यार के इजहार का दिन भी है। आजकल शादी के बाद के रिश्ते दो साल भी नहीं ठहर पा रहे हैं लेकिन इन सबके बीच आज भी ऐसे कपल हैं जिन्होंने अपने प्यार को निभाया, इसे मुकाम पर पहुंचाया और आज भी एक दूसरे का साथ निभा रहे हैं।

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जयपुर

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Rakhi Hajela

Feb 14, 2023


फरवरी का महीना अपने साथ हल्की गुनगुनी धूप के साथ कई प्यार भरी कहानियां भी साथ लेकर आता है। यह दिन उन लोगों के लिए खास होता है जो एक दूसरे को अपने दिल की बात बताना चाहते हैं इसलिए इसे प्यार के इजहार का दिन भी कहा जात है। आजकल शादी के बाद के रिश्ते दो साल भी नहीं ठहर पा रहे हैं लेकिन इन सबके बीच आज भी ऐसे कपल हैं जिन्होंने अपने प्यार को निभाया, इसे मुकाम पर पहुंचाया और आज भी एक दूसरे का साथ निभा रहे हैं।
रातों रात छपवा दिए शादी के कार्ड
टूरिज्म इंडस्ट्री से जुड़े देवेंद्र शर्मा और टीचिंग लाइन से जुड़ी अनुराधा श्रीमाली के प्यार की कहानी बेहद दिलचस्प है। हुआ दरअसल यह कि देवेंद्र को प्यार हुआ अपनी भाभी की बहन अनुराधा से। जिन्हें जानते तो वह बचपन से ही थे लेकिन प्यार का अहसास उन्हें युवावस्था में उस समय हुआ जबकि भाई की शादी के समय वह अनुराधा से फिर से मिले। देवेंद्र कहते हैं कि अनुराधा को देखने के लिए मैंने अपनी एक्साइज की नौकरी छोड़कर जवाहरात का काम सीखने और काम करने का निर्णय लिया क्योंकि अनुराधा एक स्कूल में टीचर थीं और चौड़ा रास्ता रहती थीं। मुझे लगता था कि इस तरह अनुराधा को कभी कभी देख सकूंगा। चार दिन मैं वहां रहा तो मुझे अनुराधा से बात करने का मौका मिला और एक दिन उन्होंने अपने मन की बात कह दी लेकिन, उधर से जबाब नहीं मिला, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। अनुराधा बताती हैं कि एक दिन मैंने अपनी मम्मी को बता दिया कि देवेंद्र मुझे शादी के लिए प्रपोज कर रहे हैं लेकिन मैंने मना कर दिया है क्योंकि उनके भाई से बड़ी बहन की शादी हो चुकी है। मेरी मम्मी ने कहा अगर तुम्हें देवेंद्र पसंद है तो तुम हां कर दो जो होगा देखा जाएगा। बस इस तरह से हमारे प्यार की शुरुआत हुई और हमने शादी करने का निर्णय ले लिया। मुश्किल तब हुई जबकि देवेंद्र का परिवार शादी के लिए तैयार नहीं हुआ। आपत्ति बस एक ही थी एक ही घर में दोनों बहनें नहीं आ सकती।
देवेंद्र कहते हैं मुझे लगा कि पैरेंट्स राजी नहीं हो रहे तो मैंने 9 मार्च 1990 को शादी करने का निर्णय लिया, रातोंरात शादी के कार्ड छपवाएं और 8 मार्च को अपने सभी रिश्तेदारों, दोस्तों और मिलने वालों को भिजवा दिए। हमने मंदिर में शादी करने का निर्णय लिया था। सभी रिश्तेदार भी आ पहुंचे ऐसे में मजबूरन परिवार वालों को भी शादी में आना पड़ा लेकिन उन्होंने हमें स्वीकार नहीं किया ऐसे में हम भांकरोटा में एक कमरा किराए पर लेकर वहां चले गए और वहां से हमारा संघर्ष शुरू हुआ। हमारे पास बस एक सूटकेस में अपने कुछ कपड़ों के अलावा कुछ भी नहीं था। यहां तक बिस्तर तक नहीं। उन मुश्किल दिनों में एक दूसरे का साथ ही था जो हम हर मुश्किल को पार गए। कुछ समय बाद परिवार ने हमारे रिश्ते को स्वीकार कर लिया। देवेंद्र और अनुराधा कहते हैं कि प्यार करना अलग बात हैं और उसे निभाकर एक दूसरे का साथ देना अलग। आज युवा जोश में आकर एक दूसरे से वादे तो करते हैं लेकिन साथ नहीं दे पाते।

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परिवार की मर्जी से करनी थी शादी
अक्षत और प्रांजल की शादी को अधिक समय नहीं हुआ है। 2019 में उनकी शादी हुई है। वह बताते हैं कि बचपन से ही एक स्कूल में स्टडी कर रहे थे लेकिन जान पहचान 11वीं क्लास में उस समय हुई जबकि स्कूल टूर पर बाहर गए। वहां से दोस्ती की शुरुआत हुई जो समय के साथ प्यार में बदल गई। अक्षत बताते हैं कि एक बार मेरे बीमार होने पर सभी फ्रेंड्स देखने के लिए घर पर आए प्रांजल भी आई और उसने मम्मी के पैर छुए, इससे मम्मी को शक हो गया कि कुछ तो है, उन्होंने मुझसे से पूछा तो मैंने उन्हें सब सच बता दिया। उन्हें प्रांजल पसंद थी, वहीं प्रांजल कहती है कि जब घर में शादी की बात चल रही थी तब पापा ने पूछा था कि अगर कोई पसंद हो तो बता देना, मुझे लगा कि सही मौका है अक्षत के बारे में बताने का, वैसे भी दोस्त के रूप में तो पापा मम्मी उन्हें जानते ही थे, पापा ने तुरंत अक्षत के पापा को कॉल कर उनसे हमारी शादी की बात की और सगाई हो गई। दो साल के बाद हमने शादी कर ली। हम यही चाहते थे कि जो भी हो पेरेंटस की मर्जी से हो।

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कुछ बन जाओ फिर हम करवा देंगे शादी
पेशे से बिजनेसमैन निखिल विजय और प्रतीक्षा दोनों मूल रूप से अलवर के रहने वाले हैं। बचपन से एक दूसरे को जानते थे। निखिल कहते हैं कि अलवर में हमारे घर पास ही थे, एक दूसरे के साथ बड़े हुए पता नहीं चला कब दोस्त बने और कब प्यार हो गया, लेकिन जब इस बात का अहसास हुआ तो मैंने सबसे पहले अपने पैरेंट्स से इसे शेयर किया। उन्होंने बस यही कहा कि पहले अपनी पढ़ाई पर फोकस करो, कुछ बन जाओ फिर हम तुम्हारी शादी करवा देंगे, उन्होंने मुझे दिल्ली जाकर अपनी आगे की पढ़ाई करने के लिए कहा। मेरे पैरेंट्स हमेशा से बेहद सपोर्टिव थे लेकिन उस समय मुझे लगता था कि शायद वह मुझे दिल्ली इसलिए भेज रहे हैं कि मैं बाहर रहूंगा को प्यार का बुखार उतर जाएगा, मैं गलत था। अपनी पढ़ाई करने दिल्ली चला गया इंजीनियङ्क्षरग पूरी करने के बाद मैंने ऑफिशियली प्रतीक्षा का प्रपोज किया। प्रतीक्षा बताती हैं कि निखिल के पूरे परिवार ने मुझ दिल से अपनाया। उनके मम्मी,पापा, बहन। मेरी मां की मृत्यु काफी पहले हो गई थी, निखिल की मां ने मुझे वहीं प्यार दिया जो एक मां देती हैं। हमारा मानना है कि अगर आप किसी से प्यार करते हैं तो उसे निभाना चाहिए लेकिन अपने परिवार को साथ लेकर चलना भी बेहद जरूरी है।