
जयपुर. घर से बाहर निकलते ही वातावरण में वाहनों और अन्य कारणों से फैल रहा प्रदूषण फेफड़ों और ह्दय के साथ दिमाग पर भी तेजी से असर बढ़ा रहा है। विभिन्न शोध के अनुसार प्रदूषण की यही गति बरकरार रही तो आने वाले समय में डिमेंशिया का खतरा 17 फीसदी तक बढ़ सकता है। इसका सर्वाधिक खतरा बुजुर्गों को है। देश में एक करोड़ से ज्यादा और राजस्थान में करीब 5 लाख वरिष्ठ नागरिक इससे ग्रसित हैं। डिमेंशिया का शिकार मानसिक रूप से इतना कमजोर हो जाता है कि उसे रोजमर्रा के कामों के लिए दूसरों की मदद लेनी पड़ती है। इस बीमारी में दिमाग के अंदर एसी प्रोटीन का निर्माण होने लगता है, जो मस्तिष्क के सेल्स को नुकसान पहुंचाती है। इससे इंसान की याददाश्त, देखने, सोचने-समझने और बोलने की क्षमता तेजी से प्रभावित होती है।
पीएम 2.5 में दो माइक्रोग्राम की वृद्धि बड़ा कारण
डिमेंशिया बढ़ने का कारण पीएम 2.5 में दो माइक्रोग्राम की वृद्धि है। इसमें प्रदूषण के अत्यंत बारीक कण आसानी से सांस के जरिए फेफड़ों और रक्त में प्रवेश कर सकते हैं। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के 51 शोध में बढ़ते प्रदूषण और डिमेंशिया के बीच संबंध उजागर हुए हैं। भारत में 2050 तक डिमेंशिया के मरीज 197 फीसदी तक बढ़ सकते हैं।
प्रदूषण के लिहाज से शहर के संवदेनशील इलाके
अजमेरी गेट
गवर्नमेंट हॉस्टल क्षेत्र
परकोटा
सांगानेर मुख्य बाजार
सिंधी कैंप के आस-पास
रेलवे स्टेशन के आस-पास
राजापार्क
दुर्गापुरा
विद्याधर नगर
प्रदूषण के बारीक कण फेफड़ें और ह्दय के साथ दिमाग पर भी असर डालते हैं। इसके कारण डिमेंशिया का खतरा बढ़ रहा है। इससे बचने के लिए मास्क का उपयोग करना चाहिए। अस्थमा और सीओपीडी के मरीजों को विशेष एहतियात बरतने की आवश्यकता है। -डॉ.वीरेन्द्र सिंह, अस्थमा रोग विशेषज्ञ
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ध्वनि प्रदूषण का लगातार संपर्क भी डिमेंशिया का जोखिम बढ़ा सकता है। ट्रैफिक के शोर से बुजुर्गों के बीच डिमेंशिया का खतरा बढ़ता है। बुजुर्ग लोगों को इसका खतरा अधिक रहता है। इसमें सोचने, याद करने और सामान्य व्यवहार करने की क्षमता प्रभावित होती है। -डॉ.भावना शर्मा, न्यूरोलॉजिस्ट, एसएमएस मेडिकल कॉलेज
Published on:
14 Apr 2023 01:45 pm
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