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आजादी की लड़ाई हो या और कोई, जनता ही होती हीरो

जयपुर। 'आज गांधी जी के विचारों को अपनाने की बहुत जरूरत है। आजादी की लड़ाई सांप्रदायिकता का विरोध और जातिवाद का विरोध जैसे मूल्यों पर टिकी थी। उन मूल्यों पर आज लगातार हमले हो रहे हैं।' यह कहना है लेखक और इतिहासकार अशोक कुमार पांडे का। वह बुधवार को भारत सेवा संस्थान और महात्मा गांधी इंस्टीटूट ऑफ गवर्नेंस एंड सोशल साइंसेज की ओर से सेंट्रल पार्क में आयोजित 'अगस्त क्रांति के प्रमुख नायक' विषय पर प्रमुख वक्ता के रूप में बोल रहे थे।

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जयपुर

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Mohmad Imran

Aug 10, 2023

आजादी की लड़ाई हो या और कोई, जनता ही होती हीरो

आजादी की लड़ाई हो या और कोई, जनता ही होती हीरो

पांडे ने कहा कि वर्ष अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन हो या कोई और आन्दोलन, उसके असली नायक देश की जनता होती है। कोई भी आन्दोलन उनकी सक्रिय भागीदारी के बिना पूरा नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि अगस्त क्रांति हो या आजादी का आन्दोलन, अगुवाई करने में गांधी, नेहरू और पटेल जैसे नाम हो सकते हैं लेकिन महत्वपूर्ण वे लोग हैं जिनकी वे अगुवाई कर रहे थे। 9 अगस्त, 1942 के दिन महात्मा गांधी ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो] का नारा दिया था, जो आंदोलन 1947 तक चला। आज गांधी जी के विचारों को अपनाने की बहुत जरूरत है। आजादी की लड़ाई सांप्रदायिकता का विरोध और जातिवाद का विरोध जैसे मूल्यों पर टिकी हुई थी, जिन पर बाद में हमारे लोकतंत्र की स्थापना हुई, उन मूल्यों पर आज लगातार हमले हो रहे हैं। इस पूरे आंदोलन में सिर्फ नायक ही नहीं बल्कि जनता की जो भागीदारी थी, उसे भी जेहन में याद रखे जाने की जरूरत है।' सुबह 11 बजे शुरू हुए कार्यक्रम में पांडे ने गांधी, आजादी के नायकों, संविधान और वर्तमान राजनीतिक परिवेश के संदर्भ में महत्वपूर्ण बातें कहीं। उन्होंने कहा कि भारत में जनता ही असली नायक है। जनता ही भारत के सामाजिक, साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए पहल करती है। इसमें दलित, आदिवासी महिलाएं सभी शामिल हैं। संविधान सबके सम्मान, अधिकार पर केन्द्रित है, तभी देश किसी एक का नहीं बल्कि सबका है। इतिहास की समझ केवल अतीत को जानने की नहीं, बल्कि भविष्य को बुनने के लिए भी आवश्यक है। इतिहास कब्रिस्तान की सैर नहीं है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भारत सेवा संस्थान के सचिव जी एस बाफना और महात्मा गांधी इंस्टीटूट ऑफ गवर्नेंस एंड सोशल साइंसेज के निदेशक डॉ. बी.एम. शर्मा थे।

युवा ही नहीं सभी को गांधी दर्शन समझने की जरूरत
मुझे लगता है कि सिर्फ युवाओं को नहीं, बल्कि समाज के हर हिस्से को गांधी के विचारों को आत्मसात करना चाहिए। सिर्फ गांधी को नहीं, बल्कि अम्बेडकर, पटेल और नेहरू को भी पढऩा चाहिए। हमें अपना इतिहास सही संदर्भों में जानना बहुत जरूरी है। ऐसा नहीं हो सकता कि आप गांधी को पढ़ें, लेकिन पटेल को या अम्बेडकर को छोड़ दें। क्योंकि इन लोगों ने अपने से पहले जो कुछ भी बेहतरीन साहित्य और इतिहास लिखा गया था, उसे गहराई से पढ़ा था। उसके सार को ग्रहण किया और अपने समय और भविष्य के लिए कुछ बेहतरीन सिद्धांत बनाए। हमारा भी यही फर्ज बनता है कि हम भी अपने पुरखों की किताबों को पढ़ें। यही ऐसा तरीका है जिससे हम आगे बढ़ सकते हैं। इसलिए युवा अपने दिमाग की खिड़कियां खुली रखें और हर तरफ के विचारों को ग्रहण करें और उनमें से चुनें कि एक न्यायसंगत समाज बनाने के लिए कौन सा विचार उपयुक्त रहेगा।

सेंट्रल पार्क में म्यूजियम हुआ तैयार, बहेगी गांधी जी के विचारों की बयार
गांधी के दर्शन को प्रदर्शित करने वाला देश का पहला म्यूजियम
गांधी के विचारों को पूरे देश में प्रसारित करने के लिए शहर के सेंट्रल पार्क में गांधी म्यूजियम बनकर लगभग तैयार है। सेंट्रल पार्क के प्रवेश द्वार नंबर 5 पर स्थित महात्मा गांधी इंस्टीटूट ऑफ गवर्नेंस एंड सोशल साइंसेज के निदेशक बी.एम. शर्मा ने बताया कि म्यूजियम का निर्माण गांधी दर्शन से आज की पीढ़ी को अवगत कराने के लिए किया गया है। इसके लिए पहली बार 'शांति एवं अहिंसा निदेशालय' की स्थापना भी की गई है।

गांधी जी का 'वैचारिक म्यूजियम'
'गांधी म्यूजियम' में उनके जीवन के सभी पहलुओं को दिखाया जाएगा। म्यूजियम की जिम्मेदारी गांधी पीस फाउंडेशन, दिल्ली के चेयरमैन कुमार प्रशांत संभाल रहे हैं। प्लस से एक्सक्लूसिव बातचीत में उन्होंने बताया, 'गांधी जी पर देशभर में बहुत म्यूजियम हैं। इसलिए इस म्यूजियम को बनाते समय मेरा फोकस इस बात पर रहा कि यह म्यूजियम अन्य संग्रहालयों से अलग हो। इस म्यूजियम में हमने गांधी जी के राजस्थान से जुड़ाव, उन्होंने यहां क्या-क्या काम किया और उनके काम को किन लोगों ने बाद में आगे बढ़ाया, इन सभी बातों को संग्रहालय में दर्शाया गया है। यहां डिस्प्ले होने वाली फोटो गांधी जी के विचारों को दर्शाएंगी। यह एक तरह से गांधी जी का 'वैचारिक म्यूजियम होगा।'

हिटलर को लिखा खत और आखिरी 'वसीयत'
प्रशांत ने बताया कि पूरा म्यूजियम गांधी जी के विचारों का परिचय होगा। करीब 850 फोटो में गांधी जी के भारत आने से पहले, स्वाधीनता संग्राम से जुडऩे के बाद और उनके विचारों में भविष्य का भारत कैसा होगा, इन बातों को दिखाया जाएगा। उनकी हत्या से पहले 29 जनवरी, 1948 की रात को उन्होंने जो आखिरी दस्तावेज लिखा था, उसे भी डिस्प्ले किया जाएगा। इसका जिक्र भी किसी म्यूजियम में नहीं किया जाता है। इसे गांधी जी की 'वसीयत' के रूप में देखा जाता है। इसके अलावा जो खत उन्होंने जर्मन तानाशाह हिटलर को लिखा था, वह भी म्यूजियम का खास आकर्षण होगा। यह गांधी जी के विचारों को प्रदर्शित करने वाला देश का पहला म्यूजियम होगा।

तीन खंडों में बंटा है म्यूजियम
यह म्यूजियम तीन अलग-अलग सेक्शन में बंटा हुआ है। म्यूजियम में प्रवेश करते ही नीचे स्थित पहले सेक्शन में देश के परतंत्र होने से जुड़े तात्कालिक कारणों को दिखाया गया है। दूसरे सेक्शन में गांधी जी के भारत आकर स्वाधीनता संग्राम से जुडऩे और तीसरे भाग में उनके उनकी कल्पना के भारत को शब्दों और चित्रों के माध्यम से हिंद स्वराज को दिखाया गया है। हर पैनल में एक सूत का धागा है, जो इस बात का प्रतीक है कि यहां रखी हर वस्तु आपस में जुड़ी हुई है। यह धागा प्रवेश द्वार से लेकर निकास तक है। यहां एक लाइब्रेरी और गांधी आश्रम के सामने मेडिटेशन कॉर्नर भी रखा गया है। नमक सत्याग्रह पर उस समय के वायसराय को खत लिखकर जो नमक का अर्थशास्त्र समझाया, वह भी यहां डिस्प्ले किया जाएगा। यह बहुत ही ऐतिहासिक है। वायसराय का उस खत का जवाब भी यहां प्रदर्शित किया गया है।

फैक्ट फाइल
-100 करोड़ का बजट इस म्यूजियम के लिए दिया गया है
-इसकी आधी लागत में म्यूजियम को बनाया गया है, क्योंकि गांधी जी फिजूलखर्ची के विरुद्ध थे
-850 से ज्यादा दुर्लभ तस्वीरें यहां प्रदर्शित की जाएंगी
-30 अगस्त तक शुरू होने की उम्मीद है